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शुक्रवार, 10 जून 2016

ग़ज़ल "डरता हूँ...." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बड़ों की देख कर हालत, बड़ा होने से डरता हूँ
मैं इस खुदगर्ज़ दुनिया में, खड़ा होने से डरता हूँ

दिया माँ ने जनम मुझको, वो इतना प्यार करती है
मैं नन्हा दीप अच्छा हूँ, घड़ा होने से डरता हूँ

कहीं हैं जात के मसले, कहीं मज़हब के झगड़े हैं  
मैं इन कुनबे-कबीलों का, धड़ा होने से डरता हूँ

कमल तालाब का हूँ मैं, हमेशा मुस्कराता हूँ
मगर खारे समन्दर में, पड़ा होने से डरता हूँ

मैं हूँ इन्सानियत के रूप में इक बीज अदना सा
चमन की क्यारियों में अब, गड़ा होने से डरता हूँ 

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