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मंगलवार, 7 जून 2016

बालकविता "काक-चेष्टा को अपनाओ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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रंग-रूप से लगता काला।
दिखता बिल्कुल भोला-भाला।।

जब खतरे की आहट पाता।
काँव-काँव करके चिल्लाता।।
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उड़ता पंख पसार गगन में।
पहुँचा बादल के आँगन में।।

शीतल छाया मन को भायी।
नाप रहा नभ की ऊँचाई।।
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चतुर बहुत है काला कागा।
किन्तु नही बन पाया राजा।।

पितृ-जनों का इससे नाता।
यह दुनिया को पाठ पढ़ाता।।
 
काक-चेष्टा को अपनाओ।
कभी न धोखा जग में पाओ।।

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