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शनिवार, 18 जून 2016

कविता "आसमान की झोली से..." (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

   
नदिया-नाले सूख रहे हैंजलचर प्यासे-प्यासे हैं।
पौधे-पेड़ बिना पानी केव्याकुल खड़े उदासे हैं।। 

चौमासे के मौसम मेंसूरज से आग बरसती है।
जल की बून्दें पा जाने कोधरती आज तरसती है।। 

नभ की ओर उठा कर मुण्डीमेंढक चिल्लाते हैं।
बरसो मेघ धड़ाके सेये कातर स्वर में गाते हैं।। 

दीन-कृषक है दुखी हुआबादल की आँख-मिचौली से।
पानी अब तक गिरा नहीक्यों आसमान की झोली से

तितली पानी की चाहत में दर-दर घूम रही है।
फड़-फड़ करती तुलसी की ठूँठों को चूम रही है।। 

दया करो घनश्यामसुधा सा अब तो जम करके बरसो।
रिमझिम झड़ी लगा जाओ, अब क्यों करते कल-परसों?

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