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मंगलवार, 14 जून 2016

दोहे "मेरी पसन्द के पैंतीस दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ' मयंक')


माता जी ने है दिया, मुझे छन्द का दान।
इसीलिए हूँ बाँटता, मैं दोहों में ज्ञान।१।
--
छोटी-छोटी बात पर, करते यहाँ विवाद।
देते बालक-बालिका, कुल को बहुत विषाद।२।
--
जिसका नहीं इलाज कुछ, ऐसा है ये रोग।
बिना विचारे खुदकुशी, कर लेते हैं लोग।३।
--
कायरता है खुदकुशी, समझ अरे नादान।
कुदरत ने इंसान को, दिया बुद्धि का दान।४।
--
लेना अपने फैसले, सोचसमझ कर आप।
एक जरा सी चूक से, छा जाता सन्ताप।५।
--
जान-बूझ कर मत करो, गलती बारम्बार।
शिक्षा लेकर भूल से, करना भूल सुधार।६।
--
सबके लिए खुले हुए, स्वर्ग-नर्क के द्वार।
कर्मयोनि मिलती नहीं, जग में बारम्बार।७।
--
गघे नहीं खाते जिसे, तम्बाकू वो चीज।
खान-पान की मनुज को, बिल्कुल नहीं तमीज।८।
--
रोग कैंसर का लगे, समझ रहे हैं लोग।
फिर भी करते जा रहे, तम्बाकू उपयोग।९।
--
तम्बाकू को त्याग दो, होगा बदन निरोग।
जीवन में अपनाइए, भोग छोड़कर योग।१०।
--
जग सूना पानी बिना, जल जीवन आधार।
धरती में जल स्रोत का, है सीमित भण्डार।११।
--
जितनी ज्यादा आ रही, आबादी की बाढ़।
उतना ही तपने लगा, जेठ और आषाढ़।१२।
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घटते ही अब जा रहे, धरती पर से वृक्ष।
सूख गया है इसलिए, वसुन्धरा का वक्ष।१३।
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लू के झाँपड़ झेल कर, खा सूरज की धूप।
अमलतास का हो गया, सोने जैसा रूप।१४।
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झूमर जैसे लग रहे, अमलतास के फूल।
छाया देता पथिक को, मौसम के अनुकूल।१५।
--
होता है धन-माल से, कोई नहीं सनाथ।।
सिर पर होना चाहिए, माता जी का हाथ।१६।
--
जिनके सिर पर है नहीं, माँ का प्यारा हाथ।
उन लोगों से पूछिए, कहते किसे अनाथ।१७।
--
उपयोगी पुस्तक नहीं, बस्ते का है भार।
बच्चों को कैसे भला, होगा इनसे प्यार।१८।
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अभिरुचियाँ समझे बिना, पौध रहे हैं रोप।
नन्हे मन पर शान से, देते कुण्ठा थोप।१९।
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जितने धरती पर हुए, राजा, रंक-फकीर।
ब्रह्मलीन सबका हुआ, भौतिक तत्व शरीर।२०।
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पल-पल में है बदलता, काया का ये रूप,
ढल जायेगी एक दिन, रंग-रूप की धूप।२१।
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ग्रह और नक्षत्र की, चाल रही है वक्र।
आने-जाने का सदा, चलता रहता चक्र।२२।
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अगले पल क्या घटेगा, कुछ भी नहीं गुमान।
अमर समझ कर जी रहा, हर जीवित इंसान।२३।
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काम करो दिन में सदा, रातों को विश्राम।
संघर्षों से जीत लो, जीवन का संग्राम।२४।
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नदियाँ-सूरज-चन्द्रमा, देते ये पैगाम।
नित्य-नियम से कीजिए, अपना सारा काम।२५।
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नहीं मिलेगी हाट में, इन्सानियत-तमीज।
बाँध लीजिए कण्ठ में, कर्मों का ताबीज।२६।
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जगतनियन्ता का करो, सच्चे मन से ध्यान।
बिना वन्दना के नहीं, मिलता है वरदान।२७।
--
उच्चारण सुधरा नहीं, बना नहीं परिवेश।
अँग्रेजी के जाल में, जकड़ा सारा देश।२८।
--
आज समय की माँग है, दो परिवेश सुधार।
कर्तव्यों के साथ में, मिलें उचित अधिकार।२९।
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गौमाता भूखी मरे, श्वान खाय मधुपर्क।
समझो ऐसे देश का, बेड़ा बिल्कुल गर्क।३०।
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चरागाह में बन गये, ऊँचे भव्य मकान।
देख दुर्दशा गाँव की, है किसान हैरान।३१।
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चोकर-चारा घास के, आसमान पर दाम।
गाय-भैंस को पालना, नहीं सरल है काम।३२।
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बेच रहे हैं दूध को, अब सारे ग्राणीण।
दही और नवनीत की, आशाएँ हैं क्षीण।३३।
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कहनेभर को रह गया, अपना देश महान।
गौशालाओं को नहीं, देता कोई दान।३४।
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माली ही खुद लूटते, अब तो बाग-बहार।
आपाधापी का हुआ, आभासी संसार।३५।



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