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शनिवार, 18 जून 2016

दोहे-पितृदिवस "जीवित देवी-देवता, दुनिया में माँ-बाप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


पितृदिवस फिर आ गया, एक साल के बाद।
अपने-अपने पिता को, सब करते हैं याद।१।
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पिता हमेशा चाहता, करे उन्नति पूत।
सुत को करनी चाहिए, अच्छी ही करतूत।२।
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बाप हाड़ धुनकर करे, पूरा घर आबाद।
मगर भार है समझती, बाबुल को औलाद।३।
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पुत्र वही है जो करे, मात-पिता का नाम।
लेकिन लड़के कर रहे, कुल को अब बदनाम।४।
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बेटा अपने बाप के, होगा यदि अनुकूल।
घर की बगिया में खिलें, तभी सुगन्धित फूल।५।
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जब तक जीवित है पिता, तब तक पुत्र सनाथ।
कहलाते बिन बाप के, जग में सभी अनाथ।६।
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जीवित देवी-देवता, दुनिया में माँ-बाप।
कभी नहीं देना इन्हें, जीवनभर सन्ताप।७।
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देते निज सन्तान को, सकल सम्पदा दान।  
मात-पिता का मत करो, कभी कहीं अपमान।८।
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रहता जिनके शीश पर, मात-पिता का हाथ।
लेकिन बिन माँ-बाप के, होते दीन-अनाथ।९।
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पूज्य पिता जी आपकावन्दन शत्-शत् बार।
बिना आपके हो गयाजीवन मुझ पर भार।१०। 

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