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शनिवार, 17 मार्च 2018

दोहे "होना मत मग़रूर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

लेखन से बढ़ कर नहीं, कोई भी आनन्द।
नियमित लेखन का कभी, काम न करना बन्द।।
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जो लिखते हैं नियम से, मन के सब अनुभाव।
उनके मन में भाव का, होता नहीं अभाव।।
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मानव ही तो जगत में, करता प्रकट विचार।
भगवन ने इंसान में, ताकत भरी अपार।।
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बहता पानी ही करे, कल-कल शब्द निनाद।
कामों से ही व्यक्ति को, रक्खा जाता याद।।
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दौलत के मद में कभी, होना मत मग़रूर।
खुद को वाद-विवाद से, रखना हरदम दूर।।
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चाहे कितने खाइए, ताकत के अवलेह।
अमर नहीं रहती कभी, मिट्टी की यह देह।।
--
लेखन-पाठन का करो, सच्चे मन से काम।
दुनिया में होगा सदा, अमर आपका नाम।।

2 टिप्‍पणियां:

  1. Heart touching. Thanks for publishing sir Ji. Jai Hind.

    उत्तर देंहटाएं
  2. जो लिखते हैं नियम से, मन के सब अनुभाव।
    उनके मन में भाव का, होता नहीं अभाव।।

    आदरणीय शास्त्री जी, एकदम मन की बात । सुंदर रचना ।आभार ।
    सादर ।

    उत्तर देंहटाएं

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