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शुक्रवार, 30 मार्च 2018

दोहे "दर्पण में तसबीर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दर्पण में आता अगर, हमको नज़र चरित्र।
कभी न फिर हम देखते, खुद का उसमें चित्र।।

गोरा-काला-गन्दुमी, या हो रूप कुरूप।
दर्पण देता है दिखा, सबको असली रूप।।

चाहे लोग प्रसन्न हों, चाहे जायें रूठ।
चटका हो दर्पण भले, नहीं बोलता झूठ।।

मन में चाहे दुःख हो, या फिर हो उल्लास।
दर्पण में मुख देख कर हो जाता आभास।।

नित्य देखता जो मनुज, दर्पण में तसबीर।
सुन्दर दिखने की सदा, करता वो तदवीर।।

नित्य नियम से कीजिए, दर्पण का उपयोग।
कभी न मन में पालिए, दर्प नाम का रोग।।

दिल की कोटर में बसा, मन है बड़ा विचित्र।
मन को दर्पण लो बना, कर लो चित्त पवित्र।।
  

2 टिप्‍पणियां:

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