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बुधवार, 7 मार्च 2018

दोहे "गेहूँ करते नृत्य" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जीवन-पथ में मत करो, कभी किसी की होड़।
मंजिल पाने के लिए, छल-प्रपञ्च दो छोड़।। 

रोजी-रोटी के लिए, होते यहाँ जुगाड़।
सम्बन्धों के साथ में, करना मत खिलवाड़।।

मात-पिता-आचार्य का, करना मत अपमान।
जाँच-परखकर पात्र को, देना भरसक दान।।

उपवन में खिलते सुमन, देते हैं सन्देश।
हर हालत में महकना, घर हो या परदेश।।

जीव-जन्तुओं पर कभी, करो न अत्याचार।
नफरत को तजकर रहो, सबके लिए उदार।।

सम्बन्धों की नाव में, करना कभी न छेद।
बेटा-बेटी में कभी, मत करना कुछ भेद।।

हवा सुहानी बह रही, गेहूँ करते नृत्य।
कुदरत करती समय पर, अपने सारे कृत्य।।



1 टिप्पणी:

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