"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

दोहे "बैशाखी-नाच रहा इंसान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बैशाखी का आ गया, देखो पावन पर्व।
खुशियाँ सबको बाँटते, सुर-नर, मुनि-गन्धर्व।।

कोई गरवा कर रहा, कोई भँगड़ा नृत्य।
खुशियों से भरपूर हैं, उत्सव के सब कृत्य।।

तितली पंख हिला रही, भँवरा गाता गीत।
उपवन में मधुमक्खियाँ, छेड़ रहीं संगीत।।

कोई गीता बाँचता, कोई पढ़े कुरान।
पाकर नये अनाज को, नाच रहा इंसान।।

सूरज पर यौवन चढ़ा, हुआ शीत का अन्त।
पतझड़ का मौसम गया, खुलकर हँसा बसन्त।।

चहक उठे कलियाँ-सुमन, महक उठे उद्यान।
पेड़ों ने धारण किये, नवपल्लव परिधान।।

वन-उपवन से उठ रही, मादक-मस्त सुगन्ध।
अनुबन्धों साथ में, कुदरत का सम्बन्ध।।

काफल और बुराँश की, देखो छटा अनूप।
वासन्ती परिवेश में, लाल हो रहा रूप।।

बया ताड़ के पेड़ पर, बुनती अपना नीड़।
गावों में भी हो गयी, अब नगरों सी भीड़।।

1 टिप्पणी:

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails