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रविवार, 22 अप्रैल 2018

गीत "घर सब बनाना जानते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

वेदना के "रूप" को पहचानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

भावनाओं पर कड़ा पहरा रहा, 
दुःख से नाता बड़ा गहरा रहा, 
मीत इनको ज़िन्दग़ी का मानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

काल का तो चक्र चलता जा रहा है
 
वक़्त ऐसे  ही निकलता जा रहा, 
ख़ाक क्यों दरबार की हम छानते हैं।
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।। 

शूल के ही साथ रहते फूल हैं
, 
एक दूजे के लिए अनुकूल हैं, 
बैर काँटों से नहीं हम ठानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

रूप तो इक रोज़ ढल ही जायेगा, 
आँच में शीशा पिघल ही जायेगा, 
तीर खुद पर किसलिए हम तानते हैं। 
धूप में घर सब बनाना जानते हैं।।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (23-04-2018) को ) "भूखी गइया कचरा चरती" (चर्चा अंक-2949) पर होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

    उत्तर देंहटाएं

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