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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

गीत "बहुत उपकार है उसका" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।
बहुत आभार है उसकाबहुत उपकार है उसका,
दिया माटी के पुतले कोउसी ने प्राण प्यारा है।।

बहाई ज्ञान की गंगामधुरता ईख में कर दी,
कभी गर्मीकभी वर्षाकभी कम्पन भरी सरदी।
किया है रात को रोशनदिये हैं चाँद और तारे,
अमावस को मिटाने कोदियों में रोशनी भर दी।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।

लगा जब रोग का सदमातो उसने ही दवा दी है,
कुहासे को मिटाने कोउसी ने तो हवा दी है।
जो रहते जंगलों मेंभीगते बारिश के पानी में,
उन्ही के वास्ते झाड़ी मे कुटिया सी छवा दी है।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।

सुबह और शाम को मच्छर, सदा गुणगान करते हैं,
जगत के उस नियन्ता कोसदा प्रणाम करते हैं।
मगर इन्सान है खुदगर्ज कितना आज के युग में ,
विपत्ति जब सताती हैनमन शैतान करते है।।
मधुर पर्यावरण जिसनेबनाया और निखारा है,
हमारा आवरण जिसनेसजाया और सँवारा है।।
 

4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 01.05.2018 को चर्चा मंच पर चर्चा - 2957 में दिया जाएगा

    हार्दिक धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर रोचक और हृदयस्पर्शी रचना आदरणीय |--
    मधुर पर्यावरण जिसने, बनाया और निखारा है,
    हमारा आवरण जिसने, सजाया और सँवारा है।
    बहुत आभार है उसका, बहुत उपकार है उसका,
    दिया माटी के पुतले को, उसी ने प्राण प्यारा है।।--------
    सचमुच उस रचनाकार का शुक्रिया अदा करना चाहिए जिसकी सारी माया है | सादर ---

    उत्तर देंहटाएं
  3. सभी विनाश को देखकर भी संभल नहीं रहे हैं ।आभार व्यक्त करना तो दूर की बात है ।

    उत्तर देंहटाएं

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