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सोमवार, 9 अप्रैल 2018

दोहागीत "खिलने लगते फूल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दोहों के ही योग से, बनता दोहागीत।
मर्म समझ लो प्यार का, ओ मेरे मनमीत।।

ढाई आखर में छिपादुनियाभर का सार।
जो नैसर्गिकरूप सेउमड़े वो है प्यार।।
प्यार नहीं है वासनाये तो है उपहार।
दिल से दिल का मिलन ही, इसका है आधार।।
प्यारभरे इस खेल में, नहीं हार औ जीत।
मर्म समझ लो प्यार का, ओ मेरे मनमीत।१।

माँगे से मिलता नहीं, कभी प्यार का दान।
छिपा हुआ है प्यार मेंजीवन का विज्ञान।
विरह तभी है जागताजब दिल में हो आग।
विरह-मिलन के मूल मेंहोता है अनुराग।।
होती प्यार-दुलार कीबड़ी अनोखी रीत।
मर्म समझ लो प्यार का, ओ मेरे मनमीत।२।

जीवनभर बहती रहेबरसाओ वो धार।
सिखलाओ संसार कोक्या होता है प्यार।।
दिल से मत तजना कभीप्रीत-रीत उद्गार।
सारस जीवनभर करेसच्चा-सच्चा प्यार।।
मन की सच्ची लगन हीकहलाती है प्रीत।।
मर्म समझ लो प्यार का, ओ मेरे मनमीत।३।

कंकड़-काँटों से भरीप्यार-प्रीत की राह।
बन जाती आसान ये, मन में हो जब चाह।।
लेकर प्रीत कुदाल कोसभी हटाना शूल।
धैर्य और बलिदान से, खिलने लगते फूल।।
सरगम के सुर जब मिलें, बजे तभी संगीत।
मर्म समझ लो प्यार का, ओ मेरे मनमीत।४।

2 टिप्‍पणियां:

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