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सोमवार, 2 अप्रैल 2018

दोहे "उड़ता गर्द-गुबार" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

पारा अब चढ़ने लगासरदी गयी सिधार।
गरम हवा के साथ में, उड़ता गर्द-गुबार।।

पक कर अब तैयार हैं, गेहूँ और मसूर।
फसल काटने चल पड़े, कृषक और मजदूर।।

जब से आया चैत हैंसूरज हुआ जवान।
सूख रहे हैं धूप सेखेत और खलिहान।।

नदियों के तट पर उगेखरबूजा-तरबूज।
ककड़ी-खीरा बदन कोरखते हैं महफूज।।

ठण्डक देता सन्तराताकत देता सेब।
महँगाई इतनी बढ़ीखाली सबकी जेब।।

2 टिप्‍पणियां:

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