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सोमवार, 21 जनवरी 2019

दोहे "कुम्भ-श्रद्धा का आधार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

संगम नगरी में जुटे, कोटि-कोटि नर-नार।
कुम्भ सनातन धर्म की, श्रद्धा का आधार।।

तप करने को आ गये, गंगा-तट पर सन्त।
भजन-कीर्तन-भागवत, करते नित्य महन्त।।

पौष विदा अब हो गया, कुहरा गया सिधार।
अमृत सबको बाँटती, गंगा जी की घार।।

धीरे-धीरे बढ़ रहा, अब दिन का दिनमान।
माघ मास में कीजिए, पूजा, जप, तप-दान।।

माता के नवरात्र हों, या कोई भी पर्व।
अपने-अपने पर्व पर, दुनियाभर को गर्व।।

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