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बुधवार, 23 जनवरी 2019

दोहे "राम आ रहे याद" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नहीं रहा अब आचरण, लोग हुए अपवित्र।
पाश्चात्य परिवेश में, दूषित हुआ चरित्र।।

बदलीं सारी नीतियाँ, बदले सभी रिवाज।
खान-पान में शुद्धता, नहीं रही है आज।।

तन पर उजले वस्त्र हैं, मन में पसरा पाप।
महज दिखावे के लिए, होते पूजा-जाप।।

बगुलों ने जब हंस का, रूप लिया हो धार।
लोकतन्त्र की नाव तब, कैसे होगी पार।।

भाषण से करते सभी, भारत को सम्पन्न।
महँगाई की मार से, जनता हुई विपन्न।।

जनमभूमि का राम की, सुलझा नहीं विवाद।
निर्वाचन के समय ही, राम आ रहे याद।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24.01.2019 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3226 में दिया जाएगा

    धन्यवाद

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर और सार्थक दोहे...

    जवाब देंहटाएं
  3. दुइ पंगत करि कहनी महँ दोइ पलक खरचाए |

    करनि माहि सदरे दिवस भर की लागत आए ||
    भावार्थ : - कथनी की दो पंक्तियाँ रचने में दो क्षण ही व्यय होते हैं किंतु इसे करनी में परिवर्तित करने हेतु दिवस भर की लागत लग जाती है |
    अर्थात : - कथनी करना सरल है उसे करनी में परिवर्तित करना कठिन है.....

    जवाब देंहटाएं

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