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गुरुवार, 24 जनवरी 2019

गीत "वैसा हिन्दुस्तान नहीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



आजादी के बाद राष्ट्र की, भाषा को सम्मान नहीं।
जैसा जन-गण ने चाहा था, वैसा ये हिन्दुस्तान नहीं।।

शासक जितने अब तक आये,
सब ने दिया दिलाशा है,
पूरी नहीं किसी ने भी की,
जनता की अभिलाषा है,
जननायक की कथनी-करणी, में देखा ईमान नहीं।
जैसा जन-गण ने चाहा था, वैसा ये हिन्दुस्तान नहीं।।

सरकारी दफ्तर में बैठे,
घूसखोर कारिन्दे हैं,
अच्छा-खासा वेतन पाकर,
हुए आचरण गन्दे हैं,
सेवा का जज्बा सेवक में, सेवा के दौरान नहीं।
जैसा जन-गण ने चाहा था, वैसा ये हिन्दुस्तान नहीं।।

सबको अपनी पड़ी यहाँ पर,
जाय भाड़ में देश भले,
अपना उल्लू सीधा करने,
दल के दल हैं आज चले,
हमें हमारे स्वर्णिम युग का, कोई यहाँ गुमान नहीं।
जैसा जन-गण ने चाहा था, वैसा ये हिन्दुस्तान नहीं।।

सीमाओं पर बिना युद्ध के,
सैनिक हों बलिदान जहाँ,
इससे अधिक शहादत का,
होगा बोलो अपमान कहाँ,
बैरी तो बैरी है उसको, करो क्षमा का दान नहीं।
जैसा जन-गण ने चाहा था, वैसा ये हिन्दुस्तान नहीं।।

1 टिप्पणी:

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