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शुक्रवार, 7 जून 2019

दोहे "आज हुई बरसात" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नभ से आग बरस रही, बढ़ा धरा का ताप।
व्याकुल होकर जीव अब, करने लगे विलाप।।

जीना दूभर हो गया, गरमी है विकराल।
नद-नाले सूखे पड़े, सूख गये हैं ताल।।

तापमान इतना बढ़ा, एसी-कूलर फेल।
कंकरीट बो कर मनुज, रहा नतीजा झेल।।

घटते जाते वृक्ष हैं, बहुत बुरा है हाल।
शीतल मन्द समीर का, है इसलिए अकाल।।

मानव जब से कर रहा, कुदरत से खिलवाड़।
दरक रहे भूचाल से, तब से रोज पहाड़।।

खेती वाली भूमि पर, बनने लगे मकान।
लुप्त हो रहे गाँव से, चरागाह-खलिहान।।

कुदरत के हर खेल में, मानव खाता मात।
कल मैंने दोहे लिखे, आज हुई बरसात।।

3 टिप्‍पणियां:

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