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सोमवार, 24 जून 2019

दोहे "झरने करते शोर" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
रिम-झिम बारिश पड़ रही, भीग रहे वन-बाग।
मौसम की बरसात से, खुश हो रहे तड़ाग।।

सड़कों में जल का जहाँ, होने लगा भराव।
कागज की बच्चे वहाँ, चला रहे हैं नाव।।

घन का गर्जन हो रहा, नभ में चारों ओर।
चातक दादुर-मोर के, मन में उठी हिलोर।।

शीतल मन्द-बयार से, छाया है आनन्द।
बारिश पड़ते ही हुए, कूलर-एसी बन्द।।

फसलों का बरसात से, है गहरा सम्बन्ध।
खेतों में उठने लगी, सोंधी-सोंधी गन्ध।।

इन्द्र देवता ने किया, धरती पर अहसान।
धान रोपने के लिए, अब चल पड़े किसान।।

नद-नाले उफना रहे, झरने करते शोर।
अबकी बार अषाढ़ में, बारिश है घनघोर।।
 

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