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रविवार, 2 जून 2019

ग़ज़ल "वहाँ दो जून की रोटी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

हमारे देश में मजदूर की, किस्मत हुई खोटी
मयस्सर है नहीं ढंग से, उन्हें दो जून की रोटी

दलाली में लगे हैं आज, अपने देश के सेवक
बगावत भी करे कैसे, वहाँ दो जून की रोटी

करे क्या झोंपड़ी फरियाद, महलों की मिनारों से
हमेशा ही रही कंगाल, है दो जून की रोटी

जो ढोते ईंट भट्टे पर, निवाला हाथ में रखकर
नहीं थाली में खाते हैं, कभी दो जून की रोटी

हमारे देश में लाखों, सिकन्दर बीनते कूड़ा
तभी मिलती है मुश्किल से, उन्हें दो जून की रोटी

बुढ़ापा आ गया उनको, पकौड़े तल के खोखे में
सभी की चाय से चलती नहीं, दो जून की रोटी

हुनर को देखता ही कौन है, दौलत की दुनिया में
हमेशा रूप’ को मिलती, जहाँ दो जून की रोटी

4 टिप्‍पणियां:


  1. जी नमस्ते,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (03-06-2019) को

    " नौतपा का प्रहार " (चर्चा अंक- 3355)
    पर भी होगी।

    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।

    आप भी सादर आमंत्रित है


    अनीता सैनी

    उत्तर देंहटाएं
  2. Thanks for sharing this valuable information with us. I will come back to your site and keep sharing this information with us
    See More .....

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बहुत सुंदर अतुलनीय।
    सादर

    उत्तर देंहटाएं

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