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सोमवार, 10 जून 2019

दोहे "लुप्त हुए चाणक्य हैं, राह दिखाये कौन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जल के बिन होने लगा, मानस बहुत अशान्त।
तपते रेगिस्तान में, लोग हो रहे क्लान्त।।
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बिन माँगे ही दे रही, अब कुदरत आघात।
आशाओं पर हो रहा, नित्य तुषारापात।।
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कदम-कदम पर घेरते, अब तो झंझावात।
धरती बंजर हो रही, बिगड़ रहे हालात।।
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शस्य-श्यामला घरा को, रहे माफिया छीन।
खेती की अब देश में, घटने लगी जमीन।।
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मजबूरी में कर रहा, भूखा प्राणायाम।
महँगाई पर है नहीं, अब तक लगी लगाम।।
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मुल्ला-पण्डित बाँटते, अधकचरा इलहाम।
कुदरत के कानून पर, लगा रहे इलजाम।।
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लुप्त हुए चाणक्य हैं, राह दिखाये कौन।
ऐसी हालत देखकर, जगतनियन्ता मौन।।

1 टिप्पणी:

  1. मुल्ला-पण्डित बाँटते, अधकचरा इलहाम।
    कुदरत के कानून पर, लगा रहे इलजाम।।

    बहुत सुंदर और सटीक ,सादर नमस्कार सर

    उत्तर देंहटाएं

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