"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

सोमवार, 10 जून 2019

दोहे "लुप्त हुए चाणक्य हैं, राह दिखाये कौन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जल के बिन होने लगा, मानस बहुत अशान्त।
तपते रेगिस्तान में, लोग हो रहे क्लान्त।।
--
बिन माँगे ही दे रही, अब कुदरत आघात।
आशाओं पर हो रहा, नित्य तुषारापात।।
--
कदम-कदम पर घेरते, अब तो झंझावात।
धरती बंजर हो रही, बिगड़ रहे हालात।।
--
शस्य-श्यामला घरा को, रहे माफिया छीन।
खेती की अब देश में, घटने लगी जमीन।।
--
मजबूरी में कर रहा, भूखा प्राणायाम।
महँगाई पर है नहीं, अब तक लगी लगाम।।
--
मुल्ला-पण्डित बाँटते, अधकचरा इलहाम।
कुदरत के कानून पर, लगा रहे इलजाम।।
--
लुप्त हुए चाणक्य हैं, राह दिखाये कौन।
ऐसी हालत देखकर, जगतनियन्ता मौन।।

1 टिप्पणी:

  1. मुल्ला-पण्डित बाँटते, अधकचरा इलहाम।
    कुदरत के कानून पर, लगा रहे इलजाम।।

    बहुत सुंदर और सटीक ,सादर नमस्कार सर

    जवाब देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

समर्थक

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails