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बावफा के लिए तो नियम हैं बहुत,
जवाब देंहटाएंबेवफाई का कोई नही तन्त्र है।
सर्प के दंश की तो दवा हैं बहुत,
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।
बहुत बढ़िया गीत...
साधुवाद
एक-एक लफ़्ज़ उस वक़्त की सच्चाई को बयान करता है जिसमें हम जी रहे हैं। इस गीत की जितनी भी प्रशंसा की जाए, अपर्याप्त ही रहेगी।
जवाब देंहटाएंयथार्थ के धरातल पर हृदयस्पर्शी सृजन।
जवाब देंहटाएंवक्त की सच्चाई दर्शाती पंक्तियाँ... आभार....
जवाब देंहटाएंयथार्थपर चोट करती सार्थक रचना , सादर शुभकामनाएं।
जवाब देंहटाएंबेवफाई का कोई मन्त्र नहीं। मयंक जी बहुत ही सुंदर व्यंग।कलम चलती रहे इसी तरह, धार भी पैनी रहे इसी तरह।धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंबहुत सटीक , सामयिक , सशक्त गीत !
जवाब देंहटाएंबधाई !@
सही चित्रण करती सार्थक सृजन आदरणीय सर,सादर नमन
जवाब देंहटाएंबावफा के लिए तो नियम हैं बहुत,
जवाब देंहटाएंबेवफाई का कोई नहीं तन्त्र है।
सर्प के दंश की तो दवा हैं बहुत,
आदमी के डसे का नहीं मन्त्र है।।
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गन्ध देना ही है पुष्प का व्याकरण,
दूध देना ही है गाय का आचरण,
तोल और माप के तो हैं मीटर बहुत,
प्यार को नापने का नहीं यन्त्र है।
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।
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ईद, होली, दिवाली के त्यौहार में,
दम्भ की है मिलावट भरी प्यार में,
आ बसी हैं विदेशों की पागल पवन,
छल-कपट से भरा आज जनतन्त्र है।
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।
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नींव कमजोर पर हैं इमारत खड़ी,
शून्य से हो रहीं हैं इबारत बड़ी,
राम के राज में चोर-डाकू बहुत,
झूठ आजाद है, सत्य परतन्त्र है।
आदमी के डसे का नही मन्त्र है।।
हमारे समय की साक्षी नीतिपरक सार्थक प्रासंगिक रचना रूप चंद्र शास्त्री मयंक की।