"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 7 मार्च 2011

"कुण्डलियाँ के साथ परिभाषा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



मित्रों! कल भाई कनिष्क कश्यप जी ने कुण्डलिया की पोस्ट लगाने पर पर अपनी टिप्पणी में कहा था- 
knkayastha ने कहा
नमन आपकाशास्त्रीजी...उत्तम रचनाएँ...
कुण्डलियों की रचना के मूल को समझाएँ तो कृपा होगी...
उन्ही के आदेश का पालन करते हुए अपनी क्षुद्रबुद्धि के अनुसार कुण्डलिया के बारे में अपना मत प्रस्तुत कर रहा हूँ।

अधिकांश विद्वान कुण्डलिया छन्द की परिभाषा निम्नवत् देते हैं-
कुण्डलिया मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता हैउसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है। परन्तु यह मेरी समझ के बाहर है। क्योंकि यह तर्क परिभाषा की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है।
यह बिल्कुल सत्य है कि कुण्डलिया छन्द का प्रारम्भ दोहे से ही होता है। जिसके प्रथम और तीसरे चरण में 13 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं। परन्तु अन्तिम दो पंक्तियों को हम दोहे की श्रेणी में नहीं रख सकते क्योंकि इसके प्रथम और तीसरे चरण में 11 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं। इसे हम सोरठा कह सकते हैं परन्तु दूसरे और अन्तिम चरण के वर्ण दीर्घ होने चाहिएँ। जिससे की छन्द की लय और गेयता बनी रहे। 
कुण्डलिया छन्द में जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता हैउसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है। इसमें कुण्डलिया का बहुत बड़ा रहस्य छिपा है। सत्य तो यह है कि इसी से इसका कुण्डलिया नाम पड़ा है।
सर्प जब कुण्डली बना कर बैठता है तो उसका मुँह और पूँछ बिल्कुल पास में होते हैं। सम्भवतः काव्यशास्त्र के मनीषियों ने यह देख कर ही इसका नाम कुण्डलिया रखा होगा और इसकी उत्पत्ति की होगी।
आज भी प्रस्तुत कर रहा हूँ 
स्वरचित दो कुण्डलियाँ!

(1)
केशर-क्यारी को सदास्नेह सुधा से सींच।
पुरुष न होता उच्च हैनारि न होती नीच।।
नारि न होती नीचपुरुष की खान यही है।
है विडम्बना फिर भी इसका मान नहीं है।।
कह ‘मयंक’ असहाय, नारि अबला-दुखियारी।
बिना स्नेह के सूख रही यह केशर-क्यारी।।

(2)
दिल मिल जाएँ दिलों सेसमझो तभी बसन्त।
पल-प्रतिपल मधुमास हैसमझो आदि न अन्त।।
समझो आदि न अन्त, खिलेंगे सुमन मनोहर।
रखना इसे सँभाल, प्यार अनमोल धरोहर।।
कह ‘मयंक’ कविराय, हृदय में चाह जगाएँ।
ऐसे करें उपाय, जगत में दिल मिल जाएँ।।


20 टिप्‍पणियां:

  1. aapne kha ki do dohon ke bich ek raula se kundliya banta hai .
    lekin meri jankari men ek doha aur ek raula hi kundliya hota hai. raula men 24-24 matraon ke char charn hote hain arthat do sorthe .
    vaise aapke kundliya shresht koti ke hain
    maine dr sansar chander ki chhnd shashter ki pustk pdhi isme dohe ke ant men guru-laghu hone ki bat nhin hai . kripya btaen ki kya dohe ke ant men guru-laghu anivary hain ya yah sirf saundry vardhk hain

    उत्तर देंहटाएं
  2. @Dilbag Virk ji!
    आपने शायद यह पोस्ट ध्यान से नहीं पढ़ी है!
    आपने जो लिखा है वह मेरा मत नहीं है।
    मैंने लिखा है-
    "अधिकांश विद्वान कुण्डलिया छन्द की परिभाषा निम्नवत् देते हैं-कुण्डलिया मात्रिक छंद है। दो दोहों के बीच एक रोला मिला कर कुण्डलिया बनती है। पहले दोहे का अंतिम चरण ही रोले का प्रथम चरण होता है तथा जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है।
    परन्तु यह मेरी समझ के बाहर है। क्योंकि यह तर्क परिभाषा की कसौटी पर खरा नहीं उतरता है।

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह बिल्कुल सत्य है कि कुण्डलिया छन्द का प्रारम्भ दोहे से ही होता है। जिसके प्रथम और तीसरे चरण में 13 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 11 मात्राएँ होती हैं। परन्तु अन्तिम दो पंक्तियों को हम दोहे की श्रेणी में नहीं रख सकते क्योंकि इसके प्रथम और तीसरे चरण में 11 मात्राएं और दूसरे तथा चौथे चरण में 13 मात्राएँ होती हैं। इसे हम सोरठा कह सकते हैं परन्तु दूसरे और अन्तिम चरण के वर्ण दीर्घ होने चाहिएँ। जिससे की छन्द की लय और गेयता बनी रहे। कुण्डलिया छन्द में जिस शब्द से कुण्डलिया का आरम्भ होता है, उसी शब्द से कुण्डलिया समाप्त भी होता है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आदरणीय शास्त्री जी,
    कुण्डली की परिभाषा बहुत स्पष्ट है.
    १-यह एक मात्रिक छंद है.
    २-यह दोहा तथा रोला के छंदों के योग से बनता है.
    ३-इसके आरम्भ में दोहा तथा बाद के चार चरणों में रोला होता है.
    ४-यह जिस शब्द से शुरू होता है उस पर ही समाप्त होता है.
    ५-इसमें छः चरण होते हैं.प्रत्येक में २४ मात्राएँ होती हैं.
    आपकी दी हुई परिभाषा से थोड़ी भिन्नता है,उम्मीद है सहमत होंगे.

    उत्तर देंहटाएं
  5. ज्ञानवर्द्धक पोस्ट ...कुण्डलियाँ बहुत अच्छी लगीं

    उत्तर देंहटाएं
  6. आदरणीय शास्त्री जी ... सुन्दर पोस्ट है यह ... ज्ञानवर्धक... कम से कम इस प्रकार के विचार विमर्श में भागीदारी करना या संगत में रहना ज्ञान को बड़ाता है... आपका पुनः धन्यवाद .. सुन्दर रचनाएं / कुंडलियाँ .. पर सांप की कुंडलियों से खासा डरती हूँ.. :))

    उत्तर देंहटाएं
  7. ज्ञानवर्द्धक जानकारी जी धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. << मात्र मेरी जानकारी के आधार पर>>


    एक दोहा + एक रोला (जिसका पहला चरण दोहे का अंतिम चरण) + एक रोला (दोहे का पहला शब्द इसका अंतिम शब्द)= एक कुण्डली


    आगे:

    दोहा छन्द के पहले और तीसरे चरण में 13 मात्रायें और दूसरे–चौथे चरण में 11 मात्राएं होती हैं। विषम (पहले और तीसरे) चरणों के आरम्भ जगण नहीं होना चाहिये और सम (दूसरे–चौथे) चरणों अन्त में लघु होना चाहिये।


    रोला मात्रिक सम छंद होता है। इसके विषम चरणों में 11 मात्राएँ और सम चरणों में 13 मात्राएँ होती हैं, अंत दीर्घ से.

    उत्तर देंहटाएं
  9. maine aapka lekh dhyan se padha tha .
    aapne any vidvanon ki jo pribhasha di hai uske aadhar par to kundliya ki 8 (2 doha 4 raula 2doha ) panktiyan ho jaengi jo srvtha anuchit hai.
    esi pribhasha maine nhin dekhi thi isilie prtikriya di thi
    vaise kunver ji ne jo pribhasha di hai vo bilkul shi aur vivad rahit hai

    उत्तर देंहटाएं
  10. सोरठा में विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है।


    सोरठा मात्रिक छंद है और यह दोहा का ठीक उलटा होता है। इसके विषम चरणों चरण में 11-11 मात्राएँ और सम चरणों (द्वितीय तथा चतुर्थ) चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना आवश्यक होता है।


    उदाहरण:

    जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।
    करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।

    उत्तर देंहटाएं
  11. ॒ Kunwar Kusumesh जी की परिभाषा में यह जिक्र नहीं आया कि:

    रोला का पहला चरण दोहे का अंतिम चरण होना चाहिये...


    इससे परिभाषा अपूर्ण हो जाती है.

    उत्तर देंहटाएं
  12. यहां पर टिप्पणीकारों द्वारा एक अच्छी उपयोगी चर्चा चल रही है, समीर जी द्वारा कुंडलियों और सौरठों की विस्तृत जानकारी दिया जाना उनके ज्ञान और इस पोस्ट की उपयोगिता को सिद्ध करता है. कौन कहता है कि ब्लाग जगत में साहित्य और साहित्यकारों की कमी है?

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  13. भाई समीरलाल जी की बात में दम है!
    तर्क की कसौटी पर भी इनकी बात खरी उतरती है!

    उत्तर देंहटाएं
  14. आभार शास्त्री जी. आपका स्नेहाशीष है. बहुत अच्छा लगा आज यहाँ का विमर्श देख. स्वस्थ, ज्ञानवर्धक.

    उत्तर देंहटाएं
  15. "रोला का पहला चरण दोहे का अंतिम चरण होना चाहिये"
    समीर जी की टिप्पणी की उपर्युक्त पंक्ति दुरुस्त है. मेरी टिप्पणी में मुझसे छूट गई है.इसे जोड़ते हुए मेरी टिप्पणी पढ़ना सही होगा.

    उत्तर देंहटाएं
  16. दोनों रचनायें बड़ी ही सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  17. सही है रोला चार चरन का होता है...कुंवर कुसुमेश जी की परिभाषा सही है.....पर कहीं कहीं प्रथम शब्द ही अम्तिम पन्क्ति का ्शब्द नहीं भी होता है अपितु पांचवी पन्क्ति के अन्त्यानुप्रास से तुकान्त समता होती है....

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails