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शनिवार, 26 नवंबर 2016

दो कुण्डलियाँ "खोल दो मन की खिड़की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

खिड़की खोली जब सुबह, आया सुखद समीर।
उपवन में मुझको दिखा, मोती जैसा नीर।।
मोती जैसे नीर, घास पर चमक रहा था।
सूरज की किरणों में, हीरक दमक रहा था।।
कह मयंक कविराय, शीत देता था झिड़की।
रवि देता सन्देश, खोल दो मन की खिड़की।।
--
अपने सुर में गी रहे, पंछी अभिनव गीत।
गूँज रहा परिवेश में, कलरव का संगीत।।
यजन-भजन करके, बन जायें सब उदगाता।
कलरव का संगीत, सीख हमको सिखलाता।।
कह मयंक होते हैं, जग में झूठे सपने।
बाँटो तो कुछ प्यार, बनेंगे सारे अपने।

1 टिप्पणी:

  1. वाह।
    दूसरी कुण्डलि प्रथम पंक्ति में गा होना चाहिये गी टंकित हो गया है ।

    उत्तर देंहटाएं

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