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शुक्रवार, 8 मई 2015

"दो कुण्डलियाँ-कोयल चहकी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गीत बना कर मैं नया, कहता मन की बात।
काम-काम में दिन गया, आयी सुख की रात।।
आयी सुख की रात, करो आराम ठाठ से।
सपनों में खो जाओ, करो अब बात खाट से।।
कह मयंक कविराय, उठो सुख-चैन मना कर।
कुछ अभिनव सन्देश, सुनाओ गीत बना कर।।
--
चहकी कोयल बाग में, देख आम पर बौर।
कुदरत के उपहार को, धरती हूँ सिरमौर।।
धरती हूँ सिरमौर, खुशी के गीत सुनाऊँ।
अपने मीठे सुर से, खुशियों को उपजाऊँ।।
कह “मयंक” कविराय, आज शाखाएँ बहकी।
होकर भावविभोर, तभी तो कोयल चहकी।।

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