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बुधवार, 9 मार्च 2011

"कड़वी कुण्डलियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


होली के रंग में,
भंग की तरंग में,
रंगों की फुहार,
छींटे और बौछार
सबको अच्छे लगते हैं!
इस क्रम में आज प्रस्तुत हैं -

♥♥ दो कड़वीं कुँडलियाँ ♥♥ 


(1)
चिट्ठाकारी को लगा, बेनामी का रोग।
टिप्पणियों को दानकर, देते मोहन भोग।।
देते मोहन भोग, सृजन का लक्ष यही है।
अपनेपन का सन्देशों में पक्ष नहीं है।।
कह मयंक हथियार बिना है मारामारी।
टिपियाने का नाम, आज है चिट्ठाकारी।।
(2)

झूठी सुन तारीफ को, मन ही मन हर्षाय।
जब सुनते आलोचना, हृदय कुन्द हो जाए।।
हृदय कुन्द हो जाए, विरोधी बन जाते हैं।
खुदगर्जीँ में सच को, सहन न कर पाते हैं।।
कह मयंक ब्लॉगिंग की दुनिया बहुत अनूठी।
हर्षित होते लोग, प्रशंसा सुन कर झूठी।।


21 टिप्‍पणियां:

  1. bahut badhiya dono kundaliyon...aaj ke blogworld kaa sahi parimaap..

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह वाह होली के रंग भर दिये हैं …………बहुत सुन्दर्।

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह वाह होली से पहले ही रंग भरी पिचकारी मारने लगे , चिट्ठाकारी पर तो ज्यादा ही रंग पड़ गया , बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  4. मयंक जी कृपया कुंडली में मात्रायें एक बार फिर से गिनें.

    उत्तर देंहटाएं
  5. ब्लागिंग का अति भेदतम,
    सबको दियो बताय।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सार्थक और सटीक व्यंग..बहुत सुन्दर..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुमित प्रताप सिंह Sumit Pratap Singh जी!
    कहीं पर मात्राएँ घट-बढ़ रहीं हैं क्या?
    कृपया बताएं कि कहाँ पर ऐसा हुआ है!

    ९ मार्च २०११ ७:४९ अपराह्न

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुन्दर् लगी खास कर आप की... कड़वीं कुँडलियाँ, धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  9. मैं भी खटीमा आ रहा हूं आपसे कविता सीखने..

    उत्तर देंहटाएं
  10. ब्लोगिंग पर सटीक कुण्डलियाँ हैं ..

    उत्तर देंहटाएं
  11. आदरणीय शास्त्री जी आज की ब्लॉगिंग पर बहुत ही करारा प्रहार किया है आपने व्यंग्य आधारित कुण्‍डलियों के माध्यम से|
    आलोचना बल्कि यूँ कहें समालोचना तो होनी ही चाहिए| लेखकों द्वारा समालोचकों का सम्मान होना चाहिए और समालोचकों को भी हर जगह अपनी स्थिति समान रखनी चाहिए|

    एक दूसरा पहलू भी है इस का| मसलन, कुछ लोग नुक्स निकाल तो देते हैं, पर बेनामी रहते हुए और वो भी कभी कभार अतार्किक|
    तीसरा पक्ष और भी है एक - नुक्स निकालने वाले कभी कभी सामने वाले का उत्तर सुनने के लिए भी उद्यत नहीं होते|

    फिर भी हमें तो उसी कहावत को याद रखना उचित है :-

    "निन्‍दक नियरें राखियै, आँगन कुटी छवाय"

    उत्तर देंहटाएं
  12. इन्हें अगर कड़वी दवाई के रूप में पी लिया जाए,
    तो टिप्पणियों का स्वास्थ्य सुधर जाएगा! !

    उत्तर देंहटाएं
  13. सच कितना कडुवा होता है.. आपकी कुंडलियों ने सच का खुलाशा किया सो कडुवी हो गयी.. उम्दा रचना ..

    उत्तर देंहटाएं

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