भार सीने पे रख आदमी जी रहा। गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।। बाढ़ ही खेत खाने लगी आजकल, चाँदनी तन जलाने लगी आजकल, शस्त्र से शास्त्र का है कफन सीं रहा। गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।। प्यार करना है अब पाप से कम नहीं, पेट भरना है अब जाप से कम नहीं, दुनियादारी में अब तो दमन हो रहा। गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।। पानी बिकने लगा दूध के भाव पर, कौन मरहम लगायेगा अब घाव पर, तेल भी ना रहा और न अब घी रहा। गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।। |
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मंगलवार, 7 सितंबर 2010
"आदमी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सोमवार, 6 सितंबर 2010
“ओह! माह सितम्बर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| ओह! कितनी जल्दी गुजर गया पूरा सालभर फिर से आ गया है माह सितम्बर -- इस बार भी होंगे हिन्दी-दिवस के बड़े-बड़े आयोजन किन्तु सफल नही होगा सच्चे साधकों का प्रयोजन -- शान से हिन्दी पखवाड़े काले अंग्रेज मनायेंगे और हिन्दी-दिवस पर अंग्रेजी में भाषण पिलायेंगे -- स्वतन्त्र भारत में हिन्दी का जन्म-दिवस 14 सितम्बर यानि “हिन्दी-दिवस” -- कैसी है यह विडम्बना? क्या यही है हमारी सम्वेदना? -- हम हो गये हैं दिमाग से दिगम्बर हिन्दी दिवस का महीना सितम्बर -- हिन्दी त्यौहारों होली, दिवाली राम-नवमी दशहरा और कृष्ण-जन्माष्टमी की भाँति हम नहीं मना सकते थे हिन्दी-दिवस? जो चलता रहता युगों-युगों तक… युगों-युगों तक… |
रविवार, 5 सितंबर 2010
“पाँच सितम्बर-शिक्षक का अभिनन्दन” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| अध्यापक का सबसे ज्यादा भारत में सम्मान है। गोविन्द तक पहुँचाने वाला गुरू प्रथम सोपान है।। गुरू ज्ञान का शक्ति पुंज है, गुरू ही करुणा का निधान है, विद्याओं का यह निकुंज है, सबल राष्ट्र का महाप्राण है, कंचन सा कर देने वाला गुरू पारस पाषाण है। गोविन्द तक पहुँचाने वाला गुरू प्रथम सोपान है।। माँ ने दी सुन्दर सी काया, शिक्षक ने जीना सिखलाया, सामाजिकता कैसे आती, गुरू ने बालक को बतलाया, गुरू चरणों की रज में रचते-बसते चारों धाम हैं। गोविन्द तक पहुँचाने वाला गुरू प्रथम सोपान है।। आज हमारे हाथों में है, रोली, अक्षत और चन्दन, तन से मन से धन से हम, करते शिक्षक का अभिनन्दन, पाँच सितम्बर को भारत में, शिक्षक का सम्मान है। गोविन्द तक पहुँचाने वाला गुरू प्रथम सोपान है।। |
"शिक्षा और शिक्षक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
विद्याएँ लुप्तप्रायः छात्र कहाँ जायें शिक्षा का शोर ट्यूशन का जोर सजी हैं दूकानें लोग लगे हैं कमाने-खाने गुरू गायब विद्यालयों की भरमार जगत-गुरू के अच्छे नही हैं आसार ज्ञान की अमावस है आज शिक्षक दिवस है |
शनिवार, 4 सितंबर 2010
“.. …ज़माने में…!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| छलक जाते हैं अब आँसू, गजल को गुनगुनाने में। नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।। नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें, प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में। नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।। हुए बेडौल तन, चादर सिमट कर हो गई छोटी, शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज खाने में। नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।। दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर, चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में। नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।। लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे, दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में। नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।। |
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
“श्रीकृष्ण जन्मोत्सव की बधाई!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
बुधवार, 1 सितंबर 2010
“शहीदों को मेरा नमन!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
“खटीमा गोलीकाण्ड की 17वीं बरसी पर!”
| प्राण देकर किया था जिन्होंने हवन। उन शहीदों को मेरा नमन है नमन।। दूर दुर्गम पहाड़ों के जो प्राण थे, देश की सरहदों के निगहेबान थे, सारी दुनिया से प्यारा जिनको वतन। उन शहीदों को मेरा नमन है नमन। जुल्म और जोर के सामने डट गये, शीश झुकने न पाये, भले कट गये, रक्त से सींचकर है खिलाया चमन। उन शहीदों को मेरा नमन है नमन।। देशभक्ति का ज़ज़्बा दिलों में भरा, उनको प्राणों से प्यारी थी पावन धरा, कर दिया था समर्पित सुमन और तन। उन शहीदों को मेरा नमन है नमन।। खोल कर पर्वतों के नये रास्ते, मिट गये उत्तराखण्ड के वास्ते, हो गया आज साकार उनका सपन। उन शहीदों को मेरा नमन है नमन।। |
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