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शनिवार, 4 सितंबर 2010

“.. …ज़माने में…!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


छलक जाते हैं अब आँसू, गजल को गुनगुनाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


हुए बेडौल तन, चादर सिमट कर हो गई छोटी,
शजर मशगूल हैं अपने फलों को आज खाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


दरकते जा रहे अब तो, हमारी नींव के पत्थर,
चिरागों ने लगाई आग, खुद ही आशियाने में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।


लगे हैं पुण्य पर पहरे, दया के बन्द दरवाजे,
दुआएँ कैद हैं अब तो, गुनाहों की दुकानों में।
नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. समाज में कलुषता की सीवन उघाड़ती पंक्तियाँ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. नदी-तालाब खुद प्यासे, चमन में घुट रही साँसें,
    प्रभू के नाम पर योगी, लगे खाने-कमाने में।
    आज का कटु सत्य, यही सच्चाई है , बहुत खूब शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  3. छलक जाते हैं अब आँसू, गजल को गुनगुनाने में।
    नही है चैन और आराम, इस जालिम जमाने में।।

    ना हँसने देगा , ना रोने देगा
    ना जीने देगा , ना मरने देगा

    यही ज़माने का दस्तूर है
    इसमे ना तेरा कसूर
    ना मेरा कसूर है

    बेहद सुन्दर और सच को उजागर करती रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज के कटु सत्य को बताती सुन्दर रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. हकीकत को बयान करती रचना.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं
  6. अभिनव गीत..........

    वाह
    वाह

    बहुत ही सुन्दर और सार्थक सन्देश

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर,भावपूर्ण और सामयिक रचना....धन्यवाद शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  8. भावपूर्ण कविता के लिए बधाई |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  9. बेहतरीन ग़ज़ल आज के ज़माने का सत्य उजागर करती

    उत्तर देंहटाएं

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