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मंगलवार, 7 सितंबर 2010

"आदमी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

भार सीने पे रख आदमी जी रहा।
गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।।

बाढ़ ही खेत खाने लगी आजकल,
चाँदनी तन जलाने लगी आजकल,
शस्त्र से शास्त्र का है कफन सीं रहा।
गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।। 

प्यार करना है अब पाप से कम नहीं,
पेट भरना है अब जाप से कम नहीं, 
दुनियादारी में अब तो दमन हो रहा। 
गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।। 

पानी बिकने लगा दूध के भाव पर,
कौन मरहम लगायेगा अब घाव पर,
तेल भी ना रहा और न अब घी रहा।
गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. "भार सीने पे रख आदमी जी रहा।गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।।"

    बहुत खूब दर्शाया है आपने आज के हालातो को ..... बेहद उम्दा रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर रचना .....सच्चाई के बहुत करीब है !
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह मयंक जी
    क्या खूबसूरत लिखा है ...
    तेल भी ना रहा और न अब घी रहा।
    गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।।
    ........आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर शब्द दिए हैं भावों को यही सच है आज का उम्दा रचना आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह वाह

    पानी बिकने लगा दूध के भाव पर,
    कौन मरहम लगायेगा अब घाव पर,

    बहुत ख़ूब !

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच है, अधिकांश जीवन ऐसे ही हो गये हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सटीक है जी आप की यह रचना, धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत प्रेरणा मिलती है आपकी कविताओं से ...

    उत्तर देंहटाएं
  9. बाढ़ ही खेत खाने लगी आजकल,चाँदनी तन जलाने लगी आजकल,शस्त्र से शास्त्र का है कफन सीं रहा।गम के टुकड़े निगल, अश्क को पी रहा।।

    सच कहा……………हालात का सही आकलन कर दिया…………………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपने सही मुद्दे को लेकर बहुत बढ़िया और सठिक लिखा है! उम्दा प्रस्तुती !

    उत्तर देंहटाएं
  11. आज के हालात का सही आंकलन करती रचना ...बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं

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