दिल से दिल मिल जाने पर। सच्चे सब सपने हो जाते, दिवस सुहाने आने पर।। सूरज की क्या बात कहें, चन्दा भी आग उगलता है, साथ छोड़ जाती परछाई, गर्दिश के दिन आने पर। दूर-दूर से अच्छे लगते वन-पर्वत, बहती नदियाँ, कष्टों का अन्दाज़ा होता, बाशिन्दे बन जाने पर। पानी से पानी की समता, कीचड़ दाग लगाती है, साज और संगीत बताता, सुर को ग़लत लगाने पर। हर पत्थर हीरा नहीं होता, ध्यान हमेशा ये रखना, सोच-समझकर निर्णय लेना, रत्नों को अपनाने में। जो सुख-दुख में सहभागी हों, वो मिलते हैं किस्मत से, स्वर्ग, नर्क सा लगने लगता, मन का मीत न पाने पर। सच्चे सब सपने हो जाते, दिवस सुहाने आने पर।। |
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रविवार, 7 अगस्त 2011
"दिल से दिल मिल जाने पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
शनिवार, 6 अगस्त 2011
"पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
बढ़ेंगे तुम्हारी तरफ धीरे-धीरे। जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।। नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है, नया फलसफा है, नयी बन्दगी है, पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे। जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।। उल्फत की राहों की सँकरी गली है, अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है, मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे। जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।। दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी, हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी, परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे। जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।। |
शुक्रवार, 5 अगस्त 2011
"जंगली होते...." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
घर और परिवार बन्धु-बान्धव और रिश्तेदार आदर और सत्कार सभी कुछ तो है लेकिन कभी-कभी आभास होता है कि कुछ खालीपन है और यहाँ भी स्वार्थ का ही अपनापन है -- जालजगत पर कदम बढ़ाया तो यहाँ भी साहित्य-सरोवर नज़र आया किन्तु यह आभासी संसार है सिर्फ दूर-दूर का ही प्यार है लिखो तो वाह-वाही और आभार है न लिखो तो कोई पूछने वाला भी नहीं है जिन्दा हो या सिघार गये हो! जीत गये हो या हार गए हो! -- यह सब देख कर मन ऊब गया है और गहरी सोच में डूब गया है -- जब मैं गया पहाड़ों में, खेतों में जंगल में-उपवन में तब... चैन और सुकून मिला इस वैरागी मन में -- यहाँ कोई स्वार्थ नहीं है कोई बैर-भाव नहीं है सहज मुस्कान है यहाँ आकर तो मिट गई सारी थकान है -- काश् हम भी सुमन होते झाड़ी के होते या बगीचे के होते क्या फर्क पड़ता? इन्सानों की बस्ती के होते या जंगली होते.... लेकिन होते तो... खुशियाँ बाँटने वाले फूल ही.........! |
गुरुवार, 4 अगस्त 2011
"अन्तर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
जिसका अस्तित्व नही मिटा पाई,
कभी भी,समय की आंधी ।
ऐसा था,
हमारा राष्ट्र-पिता,महात्मा गान्धी ।।
कितना है कमजोर,
सेमल के पेड़ सा-
आज का नेता ।
जो किसी को,कुछ नही देता ।।
दिया सलाई का-
मजबूत बक्सा,
सेंमल द्वारा निर्मित,एक भवन ।
माचिस दिखाओ,और कर लो हवन ।
आग ही तो लगानी है,
चाहे-तन, मन, धन हो या वतन।।
यह बहुत मोटा, ताजा है,
परन्तु,
सूखे साल रूपी,गांधी की तरह बलिष्ट नही,
इसे तो गांधी की सन्तान कहते हुए भी-
.........................।।
बुधवार, 3 अगस्त 2011
"सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
![]() सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! साजन ला दो चोटी-बिन्दी, काजल काली-काली, क्रीम-पाउडर के संग में, ला दो होठों की लाली, सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! तन भी भीगा, मन भी भीगा, भीगा मेरा आँचल, कजरारी अँखियों में सुन्दर लगता सबको काजल, सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! भीनी-भीनी मस्त फुहारें, पड़ती हैं आँगन में, गाऊँगी मैं गीत प्रणय के, हरे-भरे कानन में, सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! हरियाली तीजो पर झूले पड़े हुए उपवन में, इन्द्रधनुष भी सजे हुए हैं देखो नीलगगन में, सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! भीगे खेतों में खुश हो कर धान बहुत लहराते, बारिश का पानी पी करके मेढक भी टर्राते, सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! थोड़े दिन में राखी लेकर, मैं मैके जाऊँगी, अम्मा-बाबा, भइया-भाभी से मिलकर आऊँगी, सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! गंगा-यमुना की धाराएँ, कल-कल राग सुनातीं, जल को पाकर सूखी नदियाँ, बहती हैं बलखातीं, सावन आया रे.... मस्ती लाया रे....! |
मंगलवार, 2 अगस्त 2011
“आजादी की वर्षगाँठ तो एक साल में आती है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
चौमासे में श्याम घटा जब आसमान पर छाती है। आजादी के उत्सव की वो मुझको याद दिलाती है।। देख फुहारों को उगते हैं, मेरे अन्तस में अक्षर, इनसे ही कुछ शब्द बनाकर तुकबन्दी हो जाती है। खुली हवा में साँस ले रहे हम जिनके बलिदानों से, उन वीरों की गौरवगाथा, मन में जोश जगाती है। लाठी-गोली खाकर, कारावास जिन्होंने झेला था, वो पुख़्ता बुनियाद हमारी आजादी की थाती है। खोल पुरानी पोथी-पत्री, भारत का इतिहास पढ़ो, यातनाओं के मंजर पढ़कर, छाती फटती जाती है। आओ अमर शहीदों का, हम प्रतिदिन वन्दन-नमन करें, आजादी की वर्षगाँठ तो, एक साल में आती है। |
सोमवार, 1 अगस्त 2011
"झूला झूलें सावन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें, झूला झूलें सावन में। मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। मँहगाई की मार पड़ी है, घी और तेल हुए महँगे, कैसे तलें पकौड़ी अब, पापड़ क्या भूनें सावन में। मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। हरियाली तीजों पर, कैसे लायें चोटी-बिन्दी को, सूखे मौसम में कैसे, अब सजें-सवाँरे सावन में। मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। आँगन से कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा, रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में। मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।। (चित्र गूगल छवि से साभार) |
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