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शनिवार, 6 अगस्त 2011

"पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

बढ़ेंगे तुम्हारी तरफ धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।। 

नया है मुसाफिर, नयी जिन्दगी है, 
नया फलसफा है, नयी बन्दगी है,
पढ़ेंगे-लिखेंगे, बरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।। 

उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।। 

दुर्गम डगर में हैं चट्टान भारी,
हटानी पड़ेंगी, परत आज सारी,
परबत बनेंगे, सड़क धीरे-धीरे।
जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
    बधाई स्वीकार करें ||

    ये तो जबरदस्त अंदाज है --
    गेय--
    मेरे जैसा असुर भी बड़े आराम
    से गा सकता है ||

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही खूबसूरती से लिखा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  3. किस-किस की तारीफ़ करूँ हर बन्द सुहाना लगता है।...वाह! शास्त्री जी! आप हर विधा के धुरन्धर हैं मल्टी टेलेण्टेड...वधाई और आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर भाव समन्वय्।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति आभार |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब ....सटीक प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर भाव, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  8. उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
    अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
    मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।

    apki soch samajh ,durdarshita ko pranam ,nihsandeh , aap aur srijan
    dono sarahaniya hain .... / shukriya sir.

    उत्तर देंहटाएं
  9. उल्फत की राहों की सँकरी गली है,
    अभी सो रही गुलिस्ताँ की कली है,
    मिटेगा दिलों का फरक धीरे-धीरे।
    जुबाँ से खुलेंगे, हरफ धीरे-धीरे।।

    bahut khoob
    lazvab geet

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल! बढ़िया लगा!

    उत्तर देंहटाएं

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