| कौंध गई बे-मौसम, चपला नीलगगन में! अनहोनी की आशंका, गहराई मन में!! तेजविहीन हुए तारे, चन्दा शर्माया! गन्धहीन हो गया सुमन, उपवन अकुलाया!! रंग हुए बदरंग, अल्पना डरी हुई है! भाव हुए हैं भंग कल्पना मरी हुई है!! खलिहानों में पड़े हुए गेहूँ सकुचाए! दीन-किसानों के चमके चेहरे मुर्झाए!! वही समझ सकता है, जिसकी है यह माया! कहीं गुनगुनी धूप, कहीं है शीतल छाया!! |
| जो हैं कोमल-सरल उनको मेरा नमन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। पेड़ अभिमान में थे अकड़ कर खड़े, एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े, लोच वालो का होता नही है दमन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। सख्त चट्टान पल में दरकने लगी, जल की धारा के संग में लुढ़कने लगी, छोड़ देना पड़ा कंकड़ों को वतन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। घास कोमल है लहरा रही शान से, सबको देती सलामी बड़े मान से, आँधी तूफान में भी सलामत है तन। जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। |
(21 October 1772 – 25 July 1834)

