"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

सोमवार, 19 अप्रैल 2010

“तार-तार हो गई!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

“नवगीत”
जिन्दगी हमारे, 
लिए आज भार हो गई!
मनुजता की चूनरी, 

तो तार-तार हो गई!! 


हादसे सबल हुए हैं 
गाँव-गली-राह में,
खून से सनी हुई
छुरी छिपी हैं बाँह में,
मौत जिन्दगी की, 

रेल में सवार हो गई!
मनुजता की चूनरी, 

तो तार-तार हो गई!!


चीत्कार, काँव-काँव, 
छल रहे हैं धूप छाँव,
आदमी के ठाँव-ठाँव,
चल रहे हैं पेंच-दाँव,
सभ्यता के हाथ, 

सभ्यता शिकार हो गई!
मनुजता की चूनरी, 

तो तार-तार हो गई!!

27 टिप्‍पणियां:

  1. bahut khub

    itni achi kavita par ham bhi majbur ho jate he comments ke liye


    shekar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/\

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूबसूरत गीत.....संवेदनाओं से भरी हुई

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया. बिल्कुल नीरज जी के गीत की तर्ज पर गुनगुनाया, बहुत अच्छा लगा

    उत्तर देंहटाएं
  4. हादसे सबल हुए हैं
    गाँव-गली-राह में,
    खून से सनी हुई
    छुरी छिपी हैं बाँह में,
    मौत जिन्दगी की,
    रेल में सवार हो गई!
    मनुजता की चूनरी,
    तो तार-तार हो गई

    खूबसूरत गीत ... नीरज के गीत की याद आ गयी ...
    "कारवाँ गुज़र गया गुबार देखते रहे .."

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज मनुजता
    हैवानियत की
    शिकार हो गयी
    इन्सानियत भी
    इन्सानियत पर
    भार हो गयी
    शायद इसीलिये
    मनुजता की चुनरी
    तार- तार हो गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. हादसे सबल हुए हैं
    गाँव-गली-राह में,
    खून से सनी हुई
    छुरी छिपी हैं बाँह में,
    मौत जिन्दगी की,
    रेल में सवार हो गई!
    मनुजता की चूनरी,
    तो तार-तार हो गई!!

    बेहतरीन !

    उत्तर देंहटाएं
  7. सभ्यता के हाथ,
    सभ्यता शिकार हो गई!
    मनुजता की चूनरी,
    तो तार-तार हो गई!!

    बहुत अच्छी बहुत कोमल रचना

    उत्तर देंहटाएं
  8. मौत जिन्दगी की,
    रेल में सवार हो गई!
    मनुजता की चूनरी,
    तो तार-तार हो गई!!

    lajawab!

    उत्तर देंहटाएं
  9. आतंकवाद की सच्चाई को
    उजागर करता हुआ
    बहुत बढ़िया नवगीत!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण गीत.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  11. सच मुच गीत जीने का प्रमुख साधन होते हैं

    उत्तर देंहटाएं
  12. आज के हालातों का दर्पण सा लगा.
    बहुत ही अच्छा गीत है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. वाह वाह !!!
    कितनी सहजता से सत्य को सत्यापित कर गयी यह कविता..
    सचमुच बहुत ही अच्छी लगी....
    आपकी लेखनी पर सरस्वती जी की विशेष कृपा हैं...
    आभार....

    उत्तर देंहटाएं
  14. " bahut hi acchi rachana "

    ----- eksacchai { AAWAZ }

    http://eksacchai.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  15. मनुजता की चुनरी तो मनुष्य ही तार तार कर रहे हैं ! बहुत सुन्दर रचना है !

    उत्तर देंहटाएं
  16. सभ्यता के हाथ सभ्यता शिकार हो गयी ...
    गली गली गाँव गाँव यही दृश्य हैं ...यथार्थ बोधक कविता ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  17. मौत जिन्‍दगी की रेल में सवार हो गयी। यह अच्‍छा प्रयोग है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails