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बुधवार, 14 अप्रैल 2010

“गुलाब और नागफनी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


मैं भी खिलता हूँ काँटों में
तू भी खिलता है काँटों में

Cactus 
किन्तु नहीं मैं समझ ये पाया
इन्सानों की क्या है माया


दोनों पर है चढ़ी जवानी
पर दोनों की भिन्न कहानी


मुझको सीने से चिपकाते
किन्तु तुझे नही हाथ लगाते


मैं प्रतीक हूँ प्रेम-प्रीत का
मैं प्रतीक हूँ प्रणय-रीत का


मैं गुलदस्तों में हूँ होता
लेकिन तू काँटों में रोता


सुन्दरता तेरी मन भाती
लेकिन कुछ क्षण की यह थाती


काले हीरे की खानों का
आदर होता गुणवानों का


महक लुटाता वही सुमन है
गन्ध सुमन का आभूषण है

24 टिप्‍पणियां:

  1. किन्तु नहीं मैं समझ ये पाया
    इन्सानों की क्या है माया


    दोनों पर है चढ़ी जवानी
    पर दोनों की भिन्न कहानी


    मुझको सीने से चिपकाते
    किन्तु तुझे नही हाथ लगाते

    Waah, Shashtri ji waah ! bahut khoob !

    उत्तर देंहटाएं
  2. काले हीरे की खानों का
    आदर होता गुणवानों का

    बहुत सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  3. मयंक जी,
    बहुत सुंदर। आपकी तुलनात्मक दृष्टि प्रशंसा के काबिल है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह शनदार रचना लिखा है आपने! बहुत बढ़िया लगा!

    उत्तर देंहटाएं
  5. काले हीरे की खानों का
    आदर होता गुणवानों का

    सटीक बात ...गुण हों तो बुराइयां भी अपना ली जाती हैं....बहुत सुन्दर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  6. महक लुटाता वही सुमन है
    गन्ध सुमन का आभूषण है
    क्‍या बात कही है !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. वाह शास्त्रीजी !
    रचना का नवनीत ही संपूर्ण जीवन का सूत्रवाक्य भी है ।

    महक लुटाता वही सुमन है
    गन्ध सुमन का आभूषण है

    http://shabdswarrang.blogspot.com
    समय निकाल कर मेरे ब्लॉग "शस्वरं" पर भी आशीर्वाद देने पधारें ।
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  9. कम शब्दों में बहुत कुछ कह गयी यह कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  10. सत्य को प्रेषित करती सुन्दर रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  11. दोनों पर है चढ़ी जवानी
    पर दोनों की भिन्न कहानी
    ....बहुत सुंदर।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर तुलनात्मक कविता है ! इंसानों की परख भी गुणों से होनी चाहिए । लेकिन अफ़सोस कि ऐसा नहीं होता है, बल्कि बाहरी रंग ढंग और दिखावे से ज्यादा होता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  13. किन्तु नहीं मैं समझ ये पाया
    इन्सानों की क्या है माया


    दोनों पर है चढ़ी जवानी
    पर दोनों की भिन्न कहानी


    मुझको सीने से चिपकाते
    किन्तु तुझे नही हाथ लगाते


    BAHUT SUNDAR RACHNA


    SHEKHAR KUMAWAT

    http://kavyawani.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  14. shashtri ji, 1 baat satya hai....... manav bhi issi tarah se apne ko prastut karta hai.........
    jis insaan ne swayam ko kantako me bhi suvasit rakhne ka aur apne saath saath dusro ko bhi saundarya aabha se ot-prot karta hai, ghulaab sa khil jaata hai..........
    jisne iss naagfani sa vyavhaar rakha, kshanbhangur sa khilta aur murjha jaata hai...........
    Aur itna to hum sab jaante hai, ghulab ke bagiche lagte hain, aur Naagfani ka jhaad matr

    उत्तर देंहटाएं

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