| अब जला लो मशालें, गली-गाँव में, रोशनी पास खुद, चलके आती नही। राह कितनी भले ही सरल हो मगर, मंजिलें पास खुद, चलके आती नही।। लक्ष्य छोटा हो, या हो बड़ा ही जटिल, चाहे राही हो सीधा, या हो कुछ कुटिल, चलना होगा स्वयं ही बढ़ा कर कदम- साधना पास खुद, चलके आती नही।। दो कदम तुम चलो, दो कदम वो चले, दूर हो जायेंगे, एक दिन फासले, स्वप्न बुनने से चलता नही काम है- जिन्दगी पास खुद, चलके आती नही।। ख्वाब जन्नत के, नाहक सजाता है क्यों, ढोल मनमाने , नाहक बजाता है क्यों , चाह मिलती हैं, मर जाने के बाद ही- बन्दगी पास खुद, चलके आती नही।। |
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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रविवार, 1 अगस्त 2010
“… खुद चलके आती नही” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
शुक्रवार, 30 जुलाई 2010
“आग लगाए रे!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
चौमासे में आसमान में, घिर-घिर बादल आये रे! श्याम-घटाएँ विरहनिया के, मन में आग लगाए रे!! उनके लिए सुखद चौमासा, पास बसे जिनके प्रियतम, कुण्ठित हैं उनकी अभिलाषा, दूर बसे जिनके साजन , वैरिन बदली खारे जल को, नयनों से बरसाए रे! श्याम-घटाएँ विरहनिया के, मन में आग लगाए रे!! पुरवा की जब पड़ीं फुहारें, ताप धरा का बहुत बढ़ा, मस्त हवाओं के आने से , मन का पारा बहुत चढ़ा, नील-गगन के इन्द्रधनुष भी, मन को नहीं सुहाए रे! श्याम-घटाएँ विरहनिया के, मन में आग लगाए रे!! जिनके घर पक्के-पक्के हैं, बारिश उनका ताप हरे, जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं, उनके आँगन पंक भरे, कंगाली में आटा गीला, हर-पल भूख सताए रे! श्याम-घटाएँ विरहनिया के, मन में आग लगाए रे!! |
गुरुवार, 29 जुलाई 2010
“गांधी की सन्तान कहते हुए भी... ..” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| एक पादप साल का, जिसका अस्तित्व नही मिटा पाई, कभी भी,समय की आंधी । ऐसा था, हमारा राष्ट्र-पिता,महात्मा गान्धी ।। कितना है कमजोर, सेमल के पेड़ सा- आज का नेता । जो किसी को,कुछ नही देता ।। दिया सलाई का- मजबूत बक्सा, सेंमल द्वारा निर्मित,एक भवन । माचिस दिखाओ,और कर लो हवन । आग ही तो लगानी है, चाहे-तन, मन, धन हो या वतन।। यह बहुत मोटा, ताजा है, परन्तु, सूखे साल रूपी,गांधी की तरह बलिष्ट नही, इसे तो गांधी की सन्तान कहते हुए भी- .........................।। |
मंगलवार, 27 जुलाई 2010
“घोड़े बेच के भगवान सो रहा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| निर्दोष से प्रसून भी डरे हुए हैं आज। चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज। अश्लीलता के गान नौजवान गा रहा, चोली में छिपे अंग की गाथा सुना रहा, भौंडे सुरों के शोर में, सब दब गये हैं साज। चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।। श्वान और विडाल जैसा मेल हो रहा, नग्नता, निलज्जता का खेल हो रहा, कृष्ण स्वयं द्रोपदी की लूट रहे लाज। चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।। भटकी हुई जवानी है भारत के लाल की, ऐसी है दुर्दशा मेरे भारत - विशाल की, आजाद और सुभाष के सपनों पे गिरी गाज। चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।। लिखने को बहुत कुछ है अगर लिखने को आयें, लिख -कर कठोर सत्य किसे आज सुनायें, दुनिया में सिर्फ मूर्ख के, सिर पे धरा है ताज। चिड़ियों के कारागार में पड़े हुये हैं बाज।। रोती पवित्र भूमि, आसमान रो रहा, लगता है, घोड़े बेच के भगवान सो रहा, अब तक तो मात्र कोढ़ था, अब हो गयी है खाज। चिड़ियों के कारागार में पड़े हुए हैं बाज।। |
रविवार, 25 जुलाई 2010
“यही समाजवाद है…” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
| समाजवाद से- कौन है अंजाना? लोगों ने भी यह जाना। समाजवाद आ गया है, क्या यह प्रयोग नया है? डाका, राहजनी, और चोरी, सुरसा के मुँह के समान- बढ़ रही है,रिश्वतखोरी। देख रहे हैं- गरीब और मजदूर, होता जा रहा है, चिकित्सा और न्याय- उनसे दूर। बढ़ता जा रहा है- भ्रष्टाचार, व्यभिचार और शोषण, नेतागण कर रहे हैं- अपना और अपने परिवार का पोषण। क्या समाजवाद- सबके हित की-आवाज है? क्या देश में दीन-दुखी, आम आदमी का राज है? पछता रहे हैं, गरीब और कमजोर, क्यों भेजा था उन्होंने संसद में- एक निकम्मा और चोर? आज केवल- नेता ही आबाद है, जनता आज भी बरबाद है। क्या यही समाजवाद है? यही लोकतंत्र है, हाँ यही समाजवाद है। |
शुक्रवार, 23 जुलाई 2010
"गुलों की चाह में-.." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
| आज से एक सप्ताह की छुट्टी पर जा रहा हूँ! सम्भवतः 30 जुलाई को पुनः मिलूँगा! उच्चारण पर कुछ रचनाएँ कतार में लगाकर जा रहा हूँ! आज पेश कर रहा हूँ अपनी डायरी की एक पुरानी रचना- गुलों की चाह में, अपना चमन बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। चहकती थीं कभी, गुलशन की छोटी-छोटी कलियाँ जब, महकती थी कभी, उपवन की छोटी-छोटी गलियाँ जब, गगन की छाँह में, शीतल पवन बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। चमकती थी कभी बिजली, मिरे काँधे पे झुक जाते, झनकती थी कभी पायल, तुम्हारे पाँव रुक जाते, ठिठुर कर डाह में, अपना सुमन बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। सिसकते हैं अकेले अब, तुम्ही को याद कर-कर के, बिलखते हैं अकेले अब, फकत फरयाद कर-कर के, अलम की बाँह में, अपना जनम बरबाद कर डाला। वफा की राह में, चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।। |
गुरुवार, 22 जुलाई 2010
“मेरी पसन्द का गीत सुनिए” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
| आज सुनिए मेरी पसन्द का यह गीत! इसको स्वर भर कर गाया है - सुश्री मिथिलेश आर्या ने! (यह गीत मेरा लिखा हुआ नहीं है।) गीत के बोल हैं- "जीवन खतम हुआ तो जीने का ढंग आया…. जीवन खतम हुआ तो जीने का ढंग आया, जब शम्मा बुझ गयी तो महफिल में रंग आया । मन की मशीनरी ने जब ठीक चलना सीखा, तब बूढ़े तन के हर एक पुर्जे में जंग आया । जब शम्मा बुझ गयी तो महफिल में रंग आया ।। गाड़ी निकल गयी तो घर से चला मुसाफिर, मायूस हाथ खाली बैरंग लौट आया । जब शम्मा बुझ गयी तो महफिल में रंग आया ।। फुरसत के वक्त में मेरे सिमरण का वक्त निकला, उस वक्त वक्त माँगा जब वक्त तंग आया । जब शम्मा बुझ गयी तो महफिल में रंग आया । आयु ने जब सभी कुछ हथियार फेंक डाले, यमराज फौज लेकर करने को जंग आया । जब शम्मा बुझ गयी तो महफिल में रंग आया ।। |
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