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शुक्रवार, 23 जुलाई 2010

"गुलों की चाह में-.." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज से एक सप्ताह की छुट्टी पर जा रहा हूँ!
सम्भवतः 30 जुलाई को पुनः मिलूँगा!
उच्चारण पर कुछ रचनाएँ
कतार में लगाकर जा रहा हूँ!


आज पेश कर रहा हूँ  
पनी डायरी की एक पुरानी रचना- 


गुलों की चाह में,
अपना चमन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

चहकती थीं कभी,
गुलशन की छोटी-छोटी कलियाँ जब,
महकती थी कभी,
उपवन की छोटी-छोटी गलियाँ जब,
गगन की छाँह में,
शीतल पवन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

चमकती थी कभी बिजली,
मिरे काँधे पे झुक जाते,
झनकती थी कभी पायल,
तुम्हारे पाँव रुक जाते,
ठिठुर कर डाह में,
अपना सुमन बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

सिसकते हैं अकेले अब,
तुम्ही को याद कर-कर के,
बिलखते हैं अकेले अब,
फकत फरयाद कर-कर के,
अलम की बाँह में,
अपना जनम बरबाद कर डाला।
वफा की राह में,
चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।

10 टिप्‍पणियां:

  1. आज तो कुछ अलग ही तेवर हैं……………मगर अन्दाज़ ये भी बहुत ही भाया………………दिल मे उतर गयी।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बड़ी सुन्दर रचना। छुट्टियाँ आनन्दमयी बीतें।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बढ़िया और आनन्ददायक छुट्टियां मनाकर आइये.

    उत्तर देंहटाएं
  4. छुट्टियाँ ...अरे वाह ..खूब आनद लीजिए ..कविता सुन्दर है हमेशा की तरह.

    उत्तर देंहटाएं
  5. अपना चमन बरबाद कर डाला।
    चैन-औ-अमन बरबाद कर डाला।।
    जल्द से जल्द ब्लॉग जगत में लौटें!

    उत्तर देंहटाएं

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