मित्रों!
आज एक पुरानी ग़ज़ल आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ! ![]() हम गधे इस देश के है, घास खाना जानते हैं।
लात भूतों के सहजता से, नहीं कुछ
मानते हैं।।
मुफ्त का खाया हमॆशा, कोठियों में
बैठकर.
भाषणों से खेत में, फसलें उगाना
जानते हैं।
कृष्ण की मुरली चुराई, गोपियों के
वास्ते,
रात-दिन हम, रासलीला को रचाना
जानते हैं।
राम से रहमान को, हमने लड़ाया
आजतक,
हम मज़हव की आड़ में, रोटी पकाना
जानते हैं।
देशभक्तों को किया है, बन्द हमने
जेल में,
गीदड़ों की फौज से, शासन चलाना
जानते हैं।
सभ्यता की ओढ़ चादर, आ गये
बहुरूपिये,
छद्मरूपी “रूप” से, दौलत कमाना जानते हैं।
|
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मंगलवार, 22 जनवरी 2013
"ग़ज़ल-गधे इस देश के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सोमवार, 21 जनवरी 2013
"चिन्तन-मन्थन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

ये कैसा चिन्तन-मन्थन है?
आज उसी का अभिनन्दन है!
ये कैसा चिन्तन-मन्थन है?
सीधी-सादी सोनचिरैया,
राजनीति से त्रस्त हुई है,
मक्कारों की करतूतों से,
भोली जनता ग्रस्त हुई है,
सूख गई वाटिका प्यार की,
वीराना कानन नन्दन है।
ये कैसा चिन्तन-मन्थन है?
जिनको समझा परम हितैषी,
हुए लुटेरे वो अधिकारी,
खादी की केंचुली पहन कर,
लूट रहे हैं खेती-क्यारी,
मँहगाई के कारण अब तो,
चारों ओर मचा क्रन्दन हैं।
ये कैसा चिन्तन-मन्थन है?
रविवार, 20 जनवरी 2013
"शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन।
आप आकर करो अब सुवासित चमन।।
घोर
तम है भरा आज परिवेश में,
सभ्यता
सो गई आज तो देश में,
हो
रहा है सुरा का यहाँ आचमन।
आप आकर करो अब सुवासित चमन।।
दो
सुमेधा मैं मेधा से अनजान हूँ,
माँगता
ऐसे छन्दों का वरदान हूँ,
जिनसे
आये हमारे वतन में अमन।
आप आकर करो अब सुवासित चमन।।
अर्चना-वन्दना
आपकी कर रहा,
शीश
चरणों में, मैं आपके धर रहा,
आपके
दर्शनों के हैं प्यासे नयन।
आप आकर करो अब सुवासित चमन।।
मेरे
कानों में वीणा बजा दीजिए,
कोरे
पन्नों में अक्षर सजा दीजिए,
मेरे
मन को बना दीजिएगा सुमन।
आप आकर करो अब सुवासित चमन।।
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शनिवार, 19 जनवरी 2013
"भजन-दुनियादारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() चार दिनों का ही मेला है, सारी दुनियादारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
अमर समझता है अपने को, दुनिया का हर प्राणी,
छल-फरेब के बोल, बोलती रहती सबकी वाणी,
बिना मुहूरत निकल जायेगी इक दिन प्राणसवारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
ठाठ-बाट और महल-दुमहले, साथ न तेरे जायेंगे,
केवल मरघट तक ही सारे, रस्म निभाने आयेंगे,
जिन्दा लोगों से सब रखते, अपनी नातेदारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
काम-क्रोध, मद-लोभ सभीकुछ, जीते-जी की माया,
धू-धू करके जल जायेगी, इक दिन तेरी काया,
आने के ही साथ बँधी है, जाने की तैयारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
याद करे तुझको दुनिया, तू ऐसा पुण्य कमाता जा,
मरने से पहले ऐ प्राणी, सच्चा पथ अपनाता जा,
जीवन का अवसान हो रहा, सिमट रही है पारी।
लेकिन नहीं जानता कोई, कब आयेगी बारी।।
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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013
"प्यार कहाँ से लाऊँ?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() आँखों का सागर है रोता,
अब
मनुहार कहाँ से लाऊँ?
सूख गया
भावों का सोता,
अब वो
प्यार कहाँ से लाऊँ?
पैरों
से तुमने कुचले
थे,
जब उपवन
में सुमन खिले थे,
हाथों
में है फूटा लोटा,
अब
जलधार कहाँ से लाऊँ?
अब वो
प्यार कहाँ से लाऊँ?
छल की
गागर में छल ही छल,
रस्सी
में केवल बल ही बल,
हमदर्दी
का पहन मुखौटा,
जग को
बातों से भरमाऊँ।
अब वो
प्यार कहाँ से लाऊँ?
जो बोया
वो काट रहे हैं,
तलुए
उसके चाट रहे हैं,
अपना
सिक्का निकला खोटा,
अब कैसे मैं हाथ मिलाऊँ?
अब वो
प्यार कहाँ से लाऊँ?
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गुरुवार, 17 जनवरी 2013
"जय किसान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
♥ किसान ♥
सूरज चमका नील-गगन में।
फैला उजियारा आँगन में।।
करता खेतों को प्रस्थान।।
मेहनत से अनाज उपजाता।
यह जग का है जीवन दाता।।
खून-पसीना बहा रहा है।
स्वेद-कणों से नहा रहा है।।
जीवन भर करता है काम।
लेता नही कभी विश्राम।।
चाहे सूर्य अगन बरसाये।
चाहे घटा गगन में छाये।।
यह श्रम में संलग्न हो रहा।
अपनी धुन में मग्न हो रहा।।
मत कहना इसको इन्सान।
यह धरती का है भगवान।।
|
बुधवार, 16 जनवरी 2013
“लोचन रोता है” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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जब आता है दुःख तभी, सागर सा लोचन रोता है। आँसू का अस्तित्व, नहीं सागर से कम होता है।। हार नही मानी जिसने, बहती नदियों-नहरों से, जल को लिया समेट स्वयं, गिरती-उठती लहरों से, रत्न वही पाता है जो, मंथक सक्षम होता है। आँसू का अस्तित्व, नहीं सागर से कम होता है।। जो फूलों के संग काँटों को, सहन किये जाता है, जो अमृत के साथ गरल का, घूँट पिये जाता है, शीत, ग्रीष्म और वर्षा में, वो नहीं असम होता है। आँसू का अस्तित्व, नहीं सागर से कम होता है।। |
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