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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

"प्यार कहाँ से लाऊँ?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आँखों का सागर है रोता,
अब मनुहार कहाँ से लाऊँ
सूख गया भावों का सोता
अब वो प्यार कहाँ से लाऊँ?

पैरों से तुमने कुचले थे,
जब उपवन में सुमन खिले थे,
हाथों में है फूटा लोटा,
अब जलधार कहाँ से लाऊँ?
अब वो प्यार कहाँ से लाऊँ?

छल की गागर में छल ही छल,
रस्सी में केवल बल ही बल,
हमदर्दी का पहन मुखौटा,
जग को बातों से भरमाऊँ।
अब वो प्यार कहाँ से लाऊँ?

जो बोया वो काट रहे हैं,
तलुए उसके चाट रहे हैं,
अपना सिक्का निकला खोटा,
अब कैसे मैं हाथ मिलाऊँ?
अब वो प्यार कहाँ से लाऊँ?

21 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढ़िया है गुरु जी ||
    आभार ||

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    उत्तर
    1. रस्सी पर बल हैं पड़े, रहे बलबला ऊंट |
      लाल मरुस्थल हो रहे, पर कानो में खूंट |
      पर कानो में खूंट, नहीं जूँ रेंग रहे हैं |
      टूट खड्ग की मूंठ, सभी अरमान बहे हैं |
      शत्रु काट ले शीश, यहाँ पर दारू खस्सी |
      मद में सत्ताधीश, साँप को समझें रस्सी ||

      हटाएं
  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

    उत्तर देंहटाएं
  3. उत्कृष्ट प्रस्तुति बहुत बढ़िया *****छल की गागर में छल ही छल,
    रस्सी में केवल बल ही बल,
    हमदर्दी का पहन मुखौटा,
    जग को बातों से भरमाऊँ।
    अब वो प्यार कहाँ से लाऊँ? "pyar to ek bahana ho gaya hai,pyar ka symbl lal tikona ho gya hai........"

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह ! प्रवाहमयी रोचक कविता..

    उत्तर देंहटाएं
  5. दर्द भरी .... देश प्रेम दर्शाती रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. काँटों में फूलों की कोमलता कहाँ से लायें..

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (19-1-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  9. दिखावा का जमाना है ....बहुत खूब तस्वीर दिखलाई आपने ...

    उत्तर देंहटाएं
  10. संसार बदल चूका है ..सभी मुखौटा ओढ़े हैं ..

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति... जो बोवा वो काट रहे हैं.. अब वो प्यार कहा से लाऊं..उम्दा

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,,,शास्त्री जी बधाई ,,

    recent post : बस्तर-बाला,,,

    उत्तर देंहटाएं
  13. वो प्यार सचमुच नही आयेँगा

    उत्तर देंहटाएं

  14. छल की गागर में छल ही छल,
    रस्सी में केवल बल ही बल,
    हमदर्दी का पहन मुखौटा,
    जग को बातों से भरमाऊँ।
    अब वो प्यार कहाँ से लाऊँ?

    बेहतरीन सांगीतिक रचना रिमझिम फुहार सी ,बलखाती नार सी ,पायल की झंकार सी .......प्रवाह मय वेगवती धारा सी उद्दाम आवेग समेटे

    है प्रश्न वाचक मुद्रा में ...

    उत्तर देंहटाएं
  15. छल के गागर में छल ही छल...अब प्‍यार कहां से लाउं...एकदम सच..

    उत्तर देंहटाएं

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