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मंगलवार, 22 जनवरी 2013

"ग़ज़ल-गधे इस देश के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों! 
आज एक पुरानी ग़ज़ल 
आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहा हूँ!

हम गधे इस देश के है, घास खाना जानते हैं।
लात भूतों के सहजता से, नहीं कुछ मानते हैं।।

मुफ्त का खाया हमॆशा, कोठियों में बैठकर.
भाषणों से खेत में, फसलें उगाना जानते हैं।

कृष्ण की मुरली चुराई, गोपियों के वास्ते,
रात-दिन हम, रासलीला को रचाना जानते हैं।

राम से रहमान को, हमने लड़ाया आजतक,
हम मज़हव की आड़ में, रोटी पकाना जानते हैं।

देशभक्तों को किया है, बन्द हमने जेल में,
गीदड़ों की फौज से, शासन चलाना जानते हैं।

सभ्यता की ओढ़ चादर, आ गये बहुरूपिये,
छद्मरूपी रूपसे, दौलत कमाना जानते हैं।

24 टिप्‍पणियां:

  1. वास्तविक गधों का अपमान हो रहा है शास्त्री जी !हां ..हा ..हा..
    New post कुछ पता नहीं !!! ( तृतीय और अंतिम भाग )
    New post : शहीद की मज़ार से

    उत्तर देंहटाएं
  2. आज की भ्रष्ट राजनीति पर व्यंगात्मक सुंदर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बिलकुल सही-
    बढ़िया अभिव्यक्ति-
    शुभकामनायें आदरणीय ||

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपकी इस उत्कृष्ट पोस्ट की चर्चा बुधवार (23-01-13) के चर्चा मंच पर भी है | अवश्य पधारें |
    सूचनार्थ |

    उत्तर देंहटाएं
  5. लोकतंत्र के गुण गा रहे .........गधे देश खा रहे ...........

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच बात,बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!
    राम से रहमान को, हमने लड़ाया आजतक,
    हम मज़हव की आड़ में, रोटी पकाना जानते हैं।

    देशभक्तों को किया है, बन्द हमने जेल में,
    गीदड़ों की फौज से, शासन चलाना जानते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  8. रचना में एक दम सही बात कही है |गधों की तो बात ही निराली !-
    चुरा के चरना घास, दुलत्ती और मारना |
    'ढेंचू ढेंचू' कर के भाषण रोज़ झाडना ||
    प्रपन्च वाली कूट नीति' में कितने माहिर-
    छल से हारी बाजी जीत के डींग हांकना ||

    उत्तर देंहटाएं
  9. फूट डालो और शासन करो, अंग्रेज ही सिखा कर चले गये हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  10. सामयिक प्रासंगिक दो टूक ,शर्म शिन्दों को फिर भी नहीं आती .

    हम गधे इस देश के है, घास खाना जानते हैं।
    लात भूतों के सहजता से, नहीं कुछ मानते हैं।।

    मुफ्त का खाया हमॆशा, कोठियों में बैठकर.
    भाषणों से खेत में, फसलें उगाना जानते हैं।

    कृष्ण की मुरली चुराई, गोपियों के वास्ते,
    रात-दिन हम, रासलीला को रचाना जानते हैं।

    राम से रहमान को, हमने लड़ाया आजतक,
    हम मज़हव की आड़ में, रोटी पकाना जानते हैं।

    देशभक्तों को किया है, बन्द हमने जेल में,
    गीदड़ों की फौज से, शासन चलाना जानते हैं।

    सभ्यता की ओढ़ चादर, आ गये बहुरूपिये,
    छद्मरूपी “रूप” से, दौलत कमाना जानते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  11. आप तो गजब ढाते जा रहे हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  12. कल 25/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  13. धन्यवाद !
    गधे ने गधे से कही बात एक दिन,
    धर्म शास्त्र में मै तो रहता सब दिन||
    माया चक्र में फसा काल कूटनी मीन ?
    गधा कहता गधा हो हम तेरा जींन ||

    उत्तर देंहटाएं
  14. हम गधे इस देश के है, घास खाना जानते हैं।
    लात भूतों के सहजता से, नहीं कुछ मानते हैं।।
    बहुत ही खरी खरी बातें कह दी है आपने ,शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.....
    गणतन्त्र दिवस की शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं

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