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गुरुवार, 17 जनवरी 2013

"जय किसान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

♥ किसान ♥
सूरज चमका नील-गगन में।
फैला उजियारा आँगन में।।


काँधे पर हल धरे किसान।
करता खेतों को प्रस्थान।।

मेहनत से अनाज उपजाता।
यह जग का है जीवन दाता।।

खून-पसीना बहा रहा है।
स्वेद-कणों से नहा रहा है।।

जीवन भर करता है काम।
लेता नही कभी विश्राम।।

चाहे सूर्य अगन बरसाये।
चाहे घटा गगन में छाये।।

यह श्रम में संलग्न हो रहा।
अपनी धुन में मग्न हो रहा।।

मत कहना इसको इन्सान।
यह धरती का है भगवान।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. शास्त्री जी सुन्दर गीत के माध्यम से आपने सच कहा "किसान " ही धरती का भगवान् है.
    New post कुछ पता नहीं !!! (द्वितीय भाग )
    New post: कुछ पता नहीं !!!

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रभावशाली ,
    जारी रहें।

    शुभकामना !!!

    आर्यावर्त (समृद्ध भारत की आवाज़)
    आर्यावर्त में समाचार और आलेख प्रकाशन के लिए सीधे संपादक को editor.aaryaavart@gmail.com पर मेल करें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. यह कविता तो प्राथमिक विद्यालय के सिलेबस में डालने योग्य है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रभावशाली आलेख
    खून-पसीना बहा रहा है।
    स्वेद-कणों से नहा रहा है।।

    जीवन भर करता है काम।
    लेता नही कभी विश्राम।।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर उम्दा प्रस्तुति,,,

    किसान ही अन्नदाता है
    कड़ी मेहनत कर खाता है
    देश का जीवन दाता है
    इसीलिये भगवान् कहलाता है ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर प्रभावशाली प्रस्तुति,,,

    उत्तर देंहटाएं
  8. प्रभावशाली बेहतरीन रचना।।।
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  9. देश को सशक्त आधार दे रहे हैं दोनों..

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत बढ़िया....
    अन्नदाता किसान.....

    सादर
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  11. मत कहना इसको इन्सान।
    यह धरती का है भगवान।।लाजबाब रचना

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुन्दर रचना स्कूल पाठ्य कर्म के लिए सर्वथा उपयुक्त .

    उत्तर देंहटाएं

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