मित्रों...!
गर्मी अपने पूरे यौवन पर है। ऐसे में मेरी यह बालरचना आपको जरूर सुकून देगी! ![]() पिकनिक करने का मन आया!
मोटर में सबको बैठाया!!
पहुँच गये जब नदी किनारे!
खरबूजे के खेत निहारे!!
ककड़ी, खीरा और तरबूजे!
कच्चे-पक्के थे खरबूजे!!
प्राची, किट्टू और प्रांजल!
करते थे जंगल में मंगल!!
लो मैं पेटी में भर लाया!
खरबूजों का मौसम आया!!
देख पेड़ की शीतल छाया!
हमने आसन वहाँ बिछाया!!
![]()
जम करके खरबूजे खाये!
शाम हुई घर वापिस आये!!
|
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सोमवार, 20 मई 2013
"गर्मी में खरबूजे खाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 19 मई 2013
"ठण्डक देता इसको खाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों...!
आज अपनी एक पुरानी बाल कविता
प्रस्तुत कर रहा हूँ!
जब गरमी की ऋतु आती है!
लू तन-मन को झुलसाती है!!
तब आता तरबूज सुहाना!
ठण्डक देता इसको खाना!!
यह बाजारों में बिकते हैं!
फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!!
एक रोज मन में यह ठाना!
देखें इनका ठौर-ठिकाना!!
![]()
पहुँचे जब हम नदी किनारे!
बेलों पर थे अजब नजारे!!
कुछ छोटे कुछ बहुत बड़े थे!
जहाँ-तहाँ तरबूज पड़े थे!!
इनमें से था एक उठाया!
बैठ खेत में इसको खाया!!
इसका गूदा लाल-लाल था!
ठण्डे रस का भरा माल था!!
|
शनिवार, 18 मई 2013
"मंजिल को हँसी-खेल समझना न परिन्दों " (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]() अनज़ान रास्तों पे निकलना न परिन्दों
मंजिल
को हँसी-खेल समझना न परिन्दों
आगे
कदम बढ़ाना ज़रा देख-भाल कर
काँटों
से तुम कभी भी उलझना न परिन्दों
भोले
कबूतरों के लिए ज़ाल हैं बिछे
लालच
की उस जमीं पे उतरना न परिन्दों
आजकल
के आदमी, शैतान हो गये
भरकर
चटक-लिबास, सँवरना न परिन्दों
अब
मीत-मीत का ही गला काट रहे हैं
यूँ
ही सभी के साथ, विचरना न परिन्दों
भेड़ों
के “रूप” में छिपे हैं भेड़िये यहाँ
फूलों
को देख करके मचलना न परिन्दों
|
शुक्रवार, 17 मई 2013
"अपने छोटे से जीवन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
सपने देखे मैंने मन में
अपने छोटे से जीवन
में
इठलाना-बलखाना
सीखा
हँसना और हँसाना
सीखा
सखियों के संग
झूला-झूला
मैंने इस प्यारे
मधुबन में
भाँति-भाँति के
सुमन खिले थे
आपस में सब
हिले-मिले थे
प्यार-दुलार दिया
था सबने
बचपन बीता इस गुलशन
में
एक समय ऐसा भी आया
जब मेरा यौवन
गदराया
विदा किया बाबुल
ने मुझको
भेज दिया अनजाने
वन में
अब था मेरा नया
बसेरा
नयी शाम थी नया सवेरा
सारे नये-नये अनुभव
थे
अनजाने से इस आँगन
में
कुछ दिन बाद चमन
फिर महका
कलियाँ चहकी-यौवन चहका
भारी मन से भेज
दिया था
बेटी को नूतन उपवन
में
नारी की तो कथा
यही है
आदि काल से प्रथा रही
है
पली कहीं तो, फली कहीं है
दुनिया के उन्मुक्त गगन में
|
गुरुवार, 16 मई 2013
"गांधी हम शरमिन्दा हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
|
सत्य की हार
मची हुई है
चीख-पुकार
सूरज उगल रहा है
अन्धकार
चारों ओर है
मारा-मार
सूरज है ठण्डा
चाँद है गर्म
लील रहा है धर्म को
अब तो अधर्म
तन्त्र है निकम्मा
आती है शर्म
आदमी के हो गये
उल्टे अब कर्म
गांधी जी के पालतू
अब नहीं हैं वफादार
बन गये हैं फालतू
अब तो ओहदेदार
जहर उगलते हैं
बैठे हुए नाग
लगा दिया है बापू की
खादी पर दाग़
देश में गद्दार जिन्दा हैं
गांधी हम शरमिन्दा हैं
|
बुधवार, 15 मई 2013
"पीड़ा के पाँच दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
जिनके मिलने से मिले, मन को खुशी अपार।
ऐसे सज्जनवृंद तो, मिलने अब दुश्वार।१।
अन्धकूप में खोजते, रत्नों को हम आज।
बिना पारखी दृष्टि के, अन्धा हुआ समाज।२।
नजर नजर का फेर है, नजर नजर की बात।
जिसकी नजर सुधर गई, मिली उसे सौगात।३।
शिक्षक व्यापारी बने, गुरू हो गये मौन।
कर देकर शिक्षा मिली, हुई दीक्षा गौण।४।
ज्ञान और विज्ञान की, हुई धार अब मन्द।
पाणिनि की व्याकरण के, पृष्ठ हो गये बन्द।५।
|
मंगलवार, 14 मई 2013
"ऋषियों की हम सन्ताने हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
(1)
जीवन में तम को हरने को, चिंगारी आ जाती है।
घर को आलोकित करने को, बहुत जरूरी बाती है।
होली की ज्वाला हो चाहे, तम से भरी अमावस हो-
हवनकुण्ड में ज्वाला बन, बाती कर्तव्य निभाती है।
(2)
हम दधिचि के वंशज हैं, ऋषियों की हम सन्ताने हैं।
मातृभूमि की शम्मा पर, आहुति देते परवाने हैं।
दुनियावालों भूल न करना, कायर हमें समझने की-
उग्रवाद-आतंकवाद से, डरते नहीं दीवाने हैं।
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