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गुरुवार, 16 मई 2013

"गांधी हम शरमिन्दा हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


असत्य की जीत 
सत्य की हार 
मची हुई है 
चीख-पुकार 
सूरज उगल रहा है 
अन्धकार 
चारों ओर है
मारा-मार 
सूरज है ठण्डा 
चाँद है गर्म 
लील रहा है धर्म को 
अब तो अधर्म 
तन्त्र है निकम्मा 
आती है शर्म 
आदमी के हो गये 
उल्टे अब कर्म 
गांधी जी के पालतू 
अब नहीं हैं वफादार 
बन गये हैं फालतू
अब तो ओहदेदार
जहर उगलते हैं 
बैठे हुए नाग 
लगा दिया है बापू की 
खादी पर दाग़ 
देश में गद्दार जिन्दा हैं 
गांधी हम शरमिन्दा हैं 

19 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन अभिव्यक्ति मयंक जी शव्दों के माध्यम से सुन्दर विवेचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. क्या बात है गुरु जी
    सही कहा आपने

    उत्तर देंहटाएं
  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं

  4. देश में गद्दार जिन्दा हैं
    गांधी हम शरमिन्दा हैं------
    भारत का सच
    सटीक और सच्ची बात
    आपको साधुवाद

    आप शायद नाराज हैं
    आशीर्वाद बनाये रखें

    उत्तर देंहटाएं
  5. दुख हमको भी गांधी जितना,
    और गिरेंगे जाने कितना।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर,सटीक प्रस्तुति ! !

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर,सटीक प्रस्तुति ! !आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपने लिखा....हमने पढ़ा
    और लोग भी पढ़ें;
    इसलिए कल 18/05/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  11. आदरणीय आपकी इस सार्थक रचना को 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक करके कुछ गति देने का प्रयास किया गया है।कृपया http://nirjhar-times.blogspot.com पर अवलोकन करें।आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुंदर...हां हम शर्मिंदा हैं..

    उत्तर देंहटाएं
  13. हम सब तो शर्मिंदा हैं,पर हम शब्द में नेता शामिल नहीं हैं,ये याद रहे.
    शास्त्री जी अच्छी रचना के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं

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