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मंगलवार, 14 मई 2013

"ऋषियों की हम सन्ताने हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

(1)
जीवन में तम को हरने को, चिंगारी आ जाती है।
घर को आलोकित करने को, बहुत जरूरी बाती है।
होली की ज्वाला हो चाहे, तम से भरी अमावस हो-
हवनकुण्ड में ज्वाला बन, बाती कर्तव्य निभाती है।
(2)
हम दधिचि के वंशज हैं, ऋषियों की हम सन्ताने हैं।
मातृभूमि की शम्मा पर, आहुति देते परवाने हैं।
दुनियावालों भूल न करना, कायर हमें समझने की-
उग्रवाद-आतंकवाद से, डरते नहीं दीवाने हैं। 

14 टिप्‍पणियां:

  1. बिल्कुल सही कहा है आपने .आभार .

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  2. त्याग, तपस्या अपने अन्दर बहता अब भी।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर और सार्थक मुक्तक,सादर आभार आदरणीय.

    पागल बन दुनियां में जीते हैं लोग,
    दहशत ने कायर बना दिये हैं लोग।
    कुछ का काम है गरीबों का दमन,
    अमीरों के कुचक्र में फंसते हैं लोग ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. हम लोग यही तो भूल गए हैं। आपने याद दिलाया अच्छा लगा।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आध्यात्म और जीवन दर्शन को समझाती रचना
    सादर
    आग्रह है पढ़ें "अम्मा"
    http://jyoti-khare.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दर और सार्थक रचना ..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. एक एक पंक्ति प्रेरणाप्रद है और भारतीयता की और अग्रसर करती है |

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत प्रेरक और प्रभावी प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं

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