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रविवार, 19 मई 2013

"ठण्डक देता इसको खाना" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों...!
आज अपनी एक पुरानी बाल कविता
प्रस्तुत कर रहा हूँ!
 
जब गरमी की ऋतु आती है!
लू तन-मन को झुलसाती है!!

तब आता तरबूज सुहाना!
ठण्डक देता इसको खाना!!
watermelons-5556 
यह बाजारों में बिकते हैं!
फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!!

एक रोज मन में यह ठाना!
देखें इनका ठौर-ठिकाना!!
 
पहुँचे जब हम नदी किनारे!
बेलों पर थे अजब नजारे!!

कुछ छोटे कुछ बहुत बड़े थे!
जहाँ-तहाँ तरबूज पड़े थे!!
 Watermelon field prachi
इनमें से था एक उठाया!
बैठ खेत में इसको खाया!!
 Watermelon
इसका गूदा लाल-लाल था!
ठण्डे रस का भरा माल था!!

10 टिप्‍पणियां:

  1. देख कर तबियत में ठण्डक आ गयी..

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर बाल कविता का सृजन.गर्मियों में तरबूज तो बहुत ही लाभप्रद होता ही है.आभार आपका.

    उत्तर देंहटाएं
  3. .सार्थक भावनात्मक अभिव्यक्ति .बधाई .आभार . मेरी किस्मत ही ऐसी है .
    साथ ही जानिए संपत्ति के अधिकार का इतिहास संपत्ति का अधिकार -3

    उत्तर देंहटाएं
  4. तरावट देती कविता शास्त्री जी ,मन ललचा गया तरबूज देख कर ............

    उत्तर देंहटाएं
  5. देखकर ही मुहं में पानी आ गया !!
    सुन्दर रचना !!

    उत्तर देंहटाएं

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