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शुक्रवार, 17 मई 2013

"अपने छोटे से जीवन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सपने देखे मैंने मन में 
अपने छोटे से जीवन में 

इठलाना-बलखाना सीखा 
हँसना और हँसाना सीखा 
सखियों के संग झूला-झूला 
मैंने इस प्यारे मधुबन में 

भाँति-भाँति के सुमन खिले थे 
आपस में सब हिले-मिले थे 
प्यार-दुलार दिया था सबने 
बचपन बीता इस गुलशन में 

एक समय ऐसा भी आया 
जब मेरा यौवन गदराया 
विदा किया बाबुल ने मुझको 
भेज दिया अनजाने वन में 

अब था मेरा नया बसेरा 
नयी शाम थी नया सवेरा 
सारे नये-नये अनुभव थे 
अनजाने से इस आँगन में 

कुछ दिन बाद चमन फिर महका 
कलियाँ चहकी-यौवन चहका  
भारी मन से भेज दिया था 
बेटी को नूतन उपवन में 

नारी की तो कथा यही है 
आदि काल से प्रथा रही है 
पली कहीं तो, फली कहीं है
दुनिया के उन्मुक्त गगन में 

16 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा है.... लय, ताल बहुत बढ़िया बन पड़े हैं, बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. नारी जीवन पूरा विटप प्रस्तुत किया |
    'झरें नीम की पत्तियाँ' में सर्ग का नया उपसर्ग 'दहेज़ की समस्या पर है !

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर रचना सर ,हर स्त्री की कहानी सी ....
    धन्यवाद....

    उत्तर देंहटाएं
  4. छोटा जीवन, सुखमय बीती जाती यादें।

    उत्तर देंहटाएं
  5. नारी जीवन की कहानी शब्दों में ढाल दी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. नारी जीवन तेरी यही कहानी ........सुन्दर रचना मयंक जी

    उत्तर देंहटाएं
  7. नारी जीवन को चित्रित् करता कविता...... सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  8. नारी जीवन की बहुत ही भावात्मक प्रस्तुति,आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर... नारी जीवन का चित्रण...

    उत्तर देंहटाएं

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