घूमने
सब ही यहाँ पर आ रहे हैं।
दूर
से पर्वत सभी को भा रहे हैं।।
ज़िन्दग़ी
कितनी कठिन है,
क्या
पता ये आपको?
हम
पहाड़ों के निवासी,
झेलते
सन्ताप को।
सब्जियों
के नाम पर, हम दाल-आलू खा रहे हैं।
दूर
से पर्वत सभी को भा रहे हैं।।
फट
गया बादल अगर तो,
घर
हमारे दरक जायें?
क्या
पता बरसात में,
ये
रास्ते भी सरक जायें?
हम
पहाड़ी पर्वतों की, वेदना को पा रहे हैं।
दूर
से पर्वत सभी को भा रहे हैं।।
![]()
शीत
आया बर्फ का,
देने
हमें उपहार अब।
पथ
हुए सुनसान सारे,
थम
गयी रफ्तार सब।
कपकँपाती
सर्दियों से, हाड़ जमते जा रहे हैं।
दूर
से पर्वत सभी को भा रहे हैं।।
![]()
अन्न
है दो माह का,
पर
सालभर बाकी पड़ा।
जीविका
के वास्ते,
संकट
हमारे दर खड़ा।
ज़िगर
के टुकड़े हमारे, दूर हमसे जा रहे हैं।
दूर
से पर्वत सभी को भा रहे हैं।।
हमसे
है आजाद भारत,
हम
सजग सैनिक वतन के।
पल
रहे जो कण्टकों में,
फूल
वो हम हैं चमन के।
रायफल लेकर तिरंगा-गान गाते जा रहे हैं।
दूर
से पर्वत सभी को भा रहे हैं।।
|
| "उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा। मित्रों! आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है। कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...! और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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सोमवार, 17 जून 2013
"पर्वत सभी को भा रहे हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रविवार, 16 जून 2013
"मेरा नैनीताल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
गरमी में ठण्डक पहुँचाता,
मौसम नैनीताल का!
मस्त नज़ारा मन बहलाता,
माल-रोड के माल का!!
नौका का आनन्द निराला,
क्षण में घन छा जाता काला,
शीतल पवन ठिठुरता सा तन,
याद दिलाता शॉल का!
पलक झपकते बादल आते,
गरमी में ठण्डक पहुँचाते,
कुदरता का ये अजब नज़ारा,
लगता बहुत कमाल का!
लू के गरम थपेड़े खा कर,
आम झूलते हैं डाली पर,
इन्हें देख कर मुँह में आया,
मीठा स्वाद रसाल का!
चीड़ और काफल के छौने,
पर्वत को करते हैं बौने,
हरा-भरा सा मुकुट सजाते,
ये गिरिवर के भाल का!
सजा हुआ सुन्दर बाजार,
ऊनी कपड़ों का अम्बार,
मेले-ठेले, बाजारों में,
काम नहीं कंगाल का!
गरमी में ठण्डक पहुँचाता,
मौसम नैनीताल का!
मस्त नज़ारा मन बहलाता,
माल-रोड के माल का!!
|
शनिवार, 15 जून 2013
"निज जौहर दिखलाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
हल्द्वानी में
15 जून, 2013 को
ओ.बी.ओ. द्रारा आयोजित
कविसम्मेलन/ मुशायरा में
इस व्यंग्य को पढने का मन है।
अणु और परमाणु-बम भी, सफल नही हो पायेंगे।।
सागर में डुबो फेंक दो अब, तलवार तोप और भालों को।
सेना में भर्ती कर लो, कुछ खादी वर्दी वालों को।।
शासन से कह दो अब, करना सेना का निर्माण नही।
छाँट-छाँट कर वीर-सजीले, भरती करना ज्वान नही।।
फौजों का निर्माण, शान्त उपवन में आग लगा देगा।
उज्जवल धवल पताका में, यह काला दाग लगा देगा।
नही चाहिए युद्ध-भूमि में, कुछ भी सैन्य सामान हमें।
युद्ध-क्षेत्र में, कर्म-क्षेत्र में, करना है आराम हमें।।
शत्रु नही भयभीत कदापि, तोप, टैंक और गोलों से।
इनको भय लगता है केवल, नेताओं के बोलों से।।
रण-भूमि में कुछ कारीगर, मंच बनाने वाले हों।
लाउड-स्पीकर शत्रु के दिल को दहलाने वाले हों।।
सजे-धजे अब युद्ध-मंच पर, नेता अस्त्र-शस्त्र होंगे।
सिर पर शान्ति-ध्वजा टोपी, खादी के धवल-वस्त्र होंगे।
गोलों की गति से जब नेता, भाषण ज्वाला उगलेंगे।
तरस बुढ़ापे पर खाकर, शत्रु के दिल भी पिघलेंगे।।
मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा।
भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।।
सेना में इन वृद्धजनों को, निज जौहर दिखलाना है।
युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों को पाँव जमाना है।।
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शुक्रवार, 14 जून 2013
"जल बिना बेरंग कितने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
रूप कितने-रंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।
कहीं चाँदी सी चमक है,
कहीं पर श्यामल बने हैं।
कहीं पर छितराये से हैं,
कहीं पर झुरमुट घने हैं।
मोहते ये मन सभी का,
कर रहे हैं दंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।
सींचने आये धरा को,
अमल-शीतल नीर लेकर।
हल चलेंगे खेत में अब,
धान की तकदीर लेकर।
लग रहे थे पेड़-पौधे,
जल बिना बेरंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।
आस का अंकुर उगा है,
आओ झूमें और गायें।
आओ बारिश में नहायें,
दूर गर्मी को भगायें।
कष्ट देता था पसीना,
सूखते थे अंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।
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गुरुवार, 13 जून 2013
"उमड़-घुमड़ कर आये बादल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
जल
से भर कर लाये छागल!
उमड़-घुमड़
कर आये बादल!!
कुछ
भूरे कुछ श्वेत-श्याम हैं,
लगते
ये नयनाभिराम हैं,
नील
गगन की चूनरिया पर,
शैल-शिखर
बन भाये बादल!
उमड़-घुमड़
कर आये बादल!!
खेत
सरोवर सब सूखे थे,
उपवन
पानी बिन रूखे थे,
प्यास
बुझाने को धरती की,
रिम-झिम
बारिश लाये बादल!
उमड़-घुमड़
कर आये बादल!!
बागों
में झूले चहके हैं,
ललनाओँ
के मन महके हैं,
गातीं
मेघ-मल्हार दुल्हनियाँ,
झूल
रही है कंचन-काजल!
उमड़-घुमड़
कर आये बादल!!
दादुर, मोर, पपीहा, कोयल,
सरिता
राग सुनाती कल-कल,
चपला
चम-चम चमक रही है,
आसमान
में छाये बादल!
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!
|
बुधवार, 12 जून 2013
"खो गई इन्सानियत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
![]()
मर गयी है आदमीयत
भर गई शैतानियत
देखकर धोखाधड़ी को
डर गयी मासूमियत
प्यार है केवल दिखावा
बढ़ गयी रूमानियत
आदमी में आजकल के
घट गयी ईमानियत
हो गया ईमान पैसा
खो गई इन्सानियत
कैद है दैरो-हरम में
रामियत-रहमानियत
ढोंग है अब धर्म का
और पाप की है सल्तनत
हो गया माहौल
गन्दा
वक्त की है
कैफियत
“रूप” से सब आँकते
माशूक की अब हैसियत
|
मंगलवार, 11 जून 2013
"पहली बारिश मानसून की" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कल तक बहुत सताती थी जो,
भीषण गर्मी माह जून की।
आज इन्द्र लेकर आये हैं,
पहली बारिश मानसून की।
फटी पपेली-हुआ उजाला,
आसमान पर बादल छाया,
पहले आँधी चली भयंकर,
उमड़-घुमड़ फिर पानी आया,
कितनी सुखदायी लगती है,
पहली बारिश मानसून की।
झुलस रहे थे वन-उपवन सब,
सूख रही थी पौध धान की,
आग हवा में बरस रही थी,
जलती छत पक्के मकान की,
प्यास बुझाने आयी धरा की,
पहली बारिश मानसून की।
खिले किसानों के चेहरे अब,
आस बँधी है नवल फसल की,
पौध धान की चले रोपने,
हल ने खेतों में हलचल की,
बया नीड़ से झाँक रही है,
पहली बारिश मानसून की।
बच्चे खेल रहे बारिश में,
धमाचौकड़ी खूब मचाते,
काग़ज़ की इक नाव बनाकर,
नाली में है उसे चलाते,
हरियाली को देने आयी,
पहली बारिश मानसून की।
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