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बुधवार, 12 जून 2013

"खो गई इन्सानियत" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मर गयी है आदमीयत
भर गई शैतानियत

देखकर धोखाधड़ी को
डर गयी मासूमियत

प्यार है केवल दिखावा
बढ़ गयी रूमानियत
  
आदमी में आजकल के
घट गयी ईमानियत

हो गया ईमान पैसा
खो गई इन्सानियत

कैद है दैरो-हरम में
रामियत-रहमानियत

ढोंग है अब धर्म का
और पाप की है सल्तनत

हो गया माहौल गन्दा
वक्त की है कैफियत

रूप से सब आँकते
माशूक की अब हैसियत

15 टिप्‍पणियां:

  1. सच में, कहीं जाकर सो गयी है इन्सानियत।

    उत्तर देंहटाएं
  2. .बहुत सुन्दर भावों की अभिव्यक्ति आभार रुखसार-ए-सत्ता ने तुम्हें बीमार किया है . आप भी दें अपना मत सूरज पंचोली दंड के भागी .नारी ब्लोगर्स के लिए एक नयी शुरुआत आप भी जुड़ें WOMAN ABOUT MAN क्या क़र्ज़ अदा कर पाओगे?

    उत्तर देंहटाएं
  3. सच कहा आपने, जमाने की हवा ही कुछ ऐसी है.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  4. आज के सन्दर्भ में सार्थक रचना
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर ग़ज़ल है । आप को बधाई । क्या इसे मैं अपनी पत्रिका सहजकविता में छाप सकता हूँ ? आप की अनुमति चाहिए ।

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. सुधेश जी आप मेरे नाम के साथ इस रचना को अपनी पत्रिका सहजकविता में प्रकाशित कर सकते हैं।
      आभार आपका...!

      हटाएं
  6. “रूप” से सब आँकते
    माशूक की अब हैसियत

    अब तो धन से आंकी जाती है माशूक की हैसियत .

    उत्तर देंहटाएं
  7. बढिय़ा शास्त्री जी, क्या बात है


    मीडिया के भीतर की बुराई जाननी है, फिर तो जरूर पढिए ये लेख ।
    हमारे दूसरे ब्लाग TV स्टेशन पर। " ABP न्यूज : ये कैसा ब्रेकिंग न्यूज ! "
    http://tvstationlive.blogspot.in/2013/06/abp.html

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत सुंदर बातें छोटे छोटे वाक्यों में।

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी यह प्रस्तुति कल चर्चा मंच पर है
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  10. हो गया ईमान पैसा
    खो गई इन्सानियत katu sacchai ....

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत खूब
    आदमियत यकीनन गायब है

    उत्तर देंहटाएं

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