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शुक्रवार, 14 जून 2013

"जल बिना बेरंग कितने" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रूप कितने-रंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।
 
कहीं चाँदी सी चमक है,
कहीं पर श्यामल बने हैं।
कहीं पर छितराये से हैं,
कहीं पर झुरमुट घने हैं।
मोहते ये मन सभी का,
कर रहे हैं दंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।
 
सींचने आये धरा को,
अमल-शीतल नीर लेकर।
हल चलेंगे खेत में अब,
धान की तकदीर लेकर।
लग रहे थे पेड़-पौधे,
जल बिना बेरंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।
 
आस का अंकुर उगा है,
आओ झूमें और गायें।
आओ बारिश में नहायें,
दूर गर्मी को भगायें।
कष्ट देता था पसीना,
सूखते थे अंग कितने।
बादलों के ढंग कितने।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. वाह सवन जैसा लग रहा है, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  2. हर पल रूप बदलते बादल, सुन्दर बादल..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही बेहतरीन रचना...
    :-)

    उत्तर देंहटाएं
  4. वर्षा-ऋतू का स्वागत करती सुंदर रचना ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार(15-6-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपकी यह सुन्दर रचना शनिवार 15.06.2013 को निर्झर टाइम्स (http://nirjhar-times.blogspot.in) पर लिंक की गयी है! कृपया इसे देखें और अपने सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं
  7. वर्षा ऋतु का स्वागत करती बेहतरीन रचना
    वाह-- बहुत सुंदर अनुभूति-----
    सादर

    आग्रह है- पापा ---------

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत खूबसूरत पंक्तियाँ !

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर और प्रभावी गीत...

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर...तस्‍वीर के साथ और भी

    उत्तर देंहटाएं

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