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गुरुवार, 13 जून 2013

"उमड़-घुमड़ कर आये बादल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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जल से भर कर लाये छागल!
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!

कुछ भूरे कुछ श्वेत-श्याम हैं,
लगते ये नयनाभिराम हैं,
नील गगन की चूनरिया पर,
शैल-शिखर बन भाये बादल!
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!

खेत सरोवर सब सूखे थे,
उपवन पानी बिन रूखे थे,
प्यास बुझाने को धरती की,
रिम-झिम बारिश लाये बादल!
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!

बागों में झूले चहके हैं,
ललनाओँ के मन महके हैं,
गातीं मेघ-मल्हार  दुल्हनियाँ,
झूल रही है कंचन-काजल!
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!

दादुर, मोर, पपीहा, कोयल,
सरिता राग सुनाती कल-कल,
चपला चम-चम चमक रही  है,
आसमान में छाये बादल!
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!

10 टिप्‍पणियां:

  1. बादलों की अगवानी में सुंदर गीत, शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आये बादल आये बादल
    गरज -गरज कुछ गायें बादल

    बहुत सुन्दर रचना ......सादर

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी यह सुन्दर रचना दिनांक 14.06.2013 को http://blogprasaran.blogspot.in पर लिंक की गयी है। कृपया देखें और अपना सुझाव दें।

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्दर रचना शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. काँधे धर ले आया पानी बाबा देखो ,
    वह भरी-भरी -सी नई फ़सलवाली झोली .
    मेघा की छाया घिर आई ,
    फिर धरती ने पलकें खोलीं !

    उत्तर देंहटाएं

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