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रविवार, 16 जून 2013

"मेरा नैनीताल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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गरमी में ठण्डक पहुँचाता, 
मौसम नैनीताल का! 
मस्त नज़ारा मन बहलाता, 
माल-रोड के माल का!!  
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नौका का आनन्द निराला, 
क्षण में घन छा जाता काला, 
शीतल पवन ठिठुरता सा तन, 
याद दिलाता शॉल का! 
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पलक झपकते बादल आते,
गरमी में ठण्डक पहुँचाते,
कुदरता का ये अजब नज़ारा,
लगता बहुत कमाल का!
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लू के गरम थपेड़े खा कर, 
आम झूलते हैं डाली पर, 
इन्हें देख कर मुँह में आया, 
मीठा स्वाद रसाल का! 
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चीड़ और काफल के छौने, 
पर्वत को करते हैं बौने, 
हरा-भरा सा मुकुट सजाते, 
ये गिरिवर के भाल का! 
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सजा हुआ सुन्दर बाजार,
ऊनी कपड़ों का अम्बार,
मेले-ठेले, बाजारों में,
काम नहीं कंगाल का!
गरमी में ठण्डक पहुँचाता, 
मौसम नैनीताल का! 
मस्त नज़ारा मन बहलाता, 
माल-रोड के माल का!!

8 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है शास्त्री जी ,, आपने तो पूरे नैनीताल की सैर करवा दी .. यादें ताज़ा हो गयीं ..बहुत ही सुन्दर कविता!

    उत्तर देंहटाएं
  2. सजा हुआ सुन्दर बाजार,
    ऊनी कपड़ों का अम्बार,
    मेले-ठेले, बाजारों में,
    काम नहीं कंगाल का!
    VERY NICE PRESENTATION OF FEELINGS .

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह !बन्दे मातरम् !

    आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं झांकी हिन्दुस्तान की ,

    इस मिटटी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की।

    लय ताल याद आ गई इस रचना को पढके .

    गरमी में ठण्डक पहुँचाता,
    मौसम नैनीताल का!
    मस्त नज़ारा मन बहलाता,
    माल-रोड के माल का!!बढ़िया चित्रमय प्रस्तुति .

    उत्तर देंहटाएं
  4. आनन्दित करता जाता है,
    सुन्दर वर्णन हाल का।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  6. बढ़िया प्रस्तुति गुरु जी
    वाह चित्र सहित सुंदर चित्रण नैनीताल का

    उत्तर देंहटाएं

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