सीधा-सादा. भोला-भाला।
बच्चों का संसार निराला।।
बचपन सबसे होता अच्छा।
बच्चों का मन होता सच्चा।
पल में रूठें, पल में मानें।
बैर-भाव को ये क्या जानें।।
प्यारे-प्यारे सहज-सलोने।
बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।।
बच्चों से नारी है माता।
ममता से है माँ का नाता।।
बच्चों से है दुनियादारी।
बच्चों की महिमा है न्यारी।।
कोई बचपन को लौटा दो।
फिर से बालक मुझे बना दो।।
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गुरुवार, 18 जुलाई 2013
"बचपन को लौटा दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
बुधवार, 17 जुलाई 2013
"ग़ज़ल-काँटे बुहार लेना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
फूलों को रहने देना, काँटे बुहार लेना।
जीवन के रास्तों को, ढंग से निखार लेना।
सावन की घन-घटाएँ, बरसे बिना न रहतीं,
बारिश की मार से तुम, मन को न हार देना।
इठला रहे हैं अब तो, सूखी नदी-गधेरे,
गर हो सके तो इनसे, मस्ती उधार लेना।
धरती में लहलहाते, बिरुए तुम्हें बुलाते,
करके निराई इनका, आँचल सँवार देना।
मस्ती में झूमते हैं, गुंजार कर रहे हैं,
तुम सादगी से अपने, लम्हें गुज़ार देना।
चढ़ती हुई नदी का, तो रूप मस्त होता,
तुम ज़लज़ले से अपना, यौवन उबार लेना।
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मंगलवार, 16 जुलाई 2013
"चला है दौर ये कैसा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सियासत
में विरासत का, चला है दौर ये कैसा
इबारत
में बनावट का, चला है दौर ये कैसा
जहाँ
लाचार हो जनता, जहाँ मजदूर हों घायल,
खनक
कैसे सुनायेगी, दुल्हन के पाँव की पायल,
नफासत
में हिदायत का, चला है दौर ये कैसा
लिखाकर
अपनी मर्जी का, दबाया पात्र भूतल में,
मगर
अब लौह की नौका, लगी है डूबने जल में,
लिखावट
में मिलावट का, चला है दौर ये कैसा
ख़ज़ाना
कर दिया खाली, भरी अपनी तिजोरी है,
हमारे
तो वतन में अब, पनपती घूसखोरी है,
अमानत
में खयानत का, चला है दौर ये कैसा
भिखारी
हो गये राजा, हमारे वोट को पाकर,
बुलाये
वणिक परदेशी, कमीशन की रकम खाकर,
सराफत
में हिमाकत का, चला है दौर ये कैसा
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सोमवार, 15 जुलाई 2013
‘‘रावण को जलाओ तो कोई बात बने’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]()
मीत का साथ निभाओ तो कोई बात बने।
गीत में साज बजाओ तो कोई बात बने।। एक दिन मौज मनाने से क्या भला होगा? रोज दीवाली मनाओ तो कोई बात बने। इन बनावट के उसूलों में धरा ही क्या है? प्रीत हर दिल में जगाओ तो कोई बात बने। क्यों खुदा कैद किया दैर-ओ-हरम में नादां, रब को सीने में सजाओ तो कोई बात बने। सिर्फ पुतलों के जलाने से फायदा क्या है? दिल के रावण को जलाओ तो कोई बात बने।
“रूप” की धूप रहेगी न सलामत नादां,
इश्क का ध्यान लगाओ तो कोई बात बने।
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रविवार, 14 जुलाई 2013
"रूप पुराना लगता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
वक्त
सही हो तो सारा, संसार सुहाना लगता है।
बुरे
वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।
यदि
अपने घर व्यंजन हैं, तो बाहर घी की थाली है,
भिक्षा
भी मिलनी मुश्किल, यदि अपनी झोली खाली है,
गूढ़
वचन भी निर्धन का, जग को बचकाना लगता है।
बुरे
वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।
फूटी
किस्मत हो तो, गम की भीड़ नजर आती है,
कालीनों
को बोरों की, कब पीड़ नजर आती है,
कलियों
को खिलते फूलों का रूप पुराना लगता है।
बुरे
वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।
धूप-छाँव
जैसा, अच्छा और बुरा हाल आता है,
बारह
मास गुजर जाने पर, नया साल आता है,
खुशियाँ
पा जाने पर ही अच्छा मुस्काना लगता है।
बुरे
वक्त में अपना साया भी, बेगाना लगता है।।
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शनिवार, 13 जुलाई 2013
"नहीं आता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मुझे
तो छन्द और मुक्तक, बनाना भी नहीं आता।
ग़ज़ल
में शैर और मक़्ता, लगाना भी नहीं आता।।
दिलों
के बलबलों को मैं, भला अल्फ़ाज़ कैसे दूँ,
मुझे
लफ्ज़ों का गुलदस्ता, सजाना भी नहीं आता।
सुहाने
साज मुझको, प्यार से आवाज़ देते हैं,
मगर
मजबूर हूँ, इनको बजाना भी नहीं आता।
भरा
है प्यार का सागर, मैं कैसे जाम में ढालूँ,
भरी
गागर का पानी, मुझको छलकाना नहीं आता।
महकता
है-चहकता है, ये ग़ुलशन खिलखिलाता है,
मुझे
क्यारी में खारे जल को, टपकाना नहीं आता।
भयानक
“रूप” पर, कोई फिदा
कैसे भला होगा,
मुखौटा
माँज-धोकर, मुझको चमकाना नहीं आता।
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शुक्रवार, 12 जुलाई 2013
कुछ चित्र ‘‘हाइकू’’ में (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कुछ चित्र ‘‘हाइकू’’ में
भार से कैसा लदा है?
लेकिन चलता जा रहा है,
आदमी है या गधा है?
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०- लैला तो एक है,
पागल हुए घूम रहे,
मजनूँ अनेक हैं,
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०- एक ही अनार है,
खाने को उतावले,
सैकड़ों बीमार हैं,
-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-
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एक निवेदन- नहीं विदेशी छन्द का, मुझको कोई ज्ञान। मैं भारत का आदमी, इन सबसे अनजान! |
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